महाराष्ट्र मंडल में गुड़ी उभारकर धूमधाम से मनाया गया गुड़ी पाड़वा
2024-04-09 02:49 PM
1343
रायपुर। लक्ष्य हासिल करने के लिए अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर देना ही आदमी की असली पहचान है। यह उद्गार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक केशव बलिराम हेडगेवार के थे। चैत्र प्रतिपदा, गुड़ी पाड़वा, हिंदू नव वर्ष के अवसर पर महाराष्ट्र मंडल में आयोजित कार्यक्रम में इस आशय के विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में समन्वय शाखा के प्रभारी विवेक गनोदवाले ने व्यक्त किए।
गनोदवाले ने कहा कि 1 अप्रैल 1889 को नागपुर में जन्मे डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार महज 13 साल के थे, तो उनकी मां रेवती बाई और पिता बलिराम हेडगेवार का प्लेग की बीमारी से एक ही दिन निधन हो गया। तत्पश्चात उनके पिता तुल्य चाचा बीएस मुंजे ने उनके पालन- पोषण और शिक्षा- दीक्षा की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। डाॅ. हेडगेवार को बचपन से ही अन्याय का विरोध करने की आदत थी। नागपुर के नील सिटी हाईस्कूल में एक दिन ब्रिटेन में महारानी के राज्याभिषेक के अवसर पर मिठाई का वितरण किया जा रहा था। डाॅ. हेडगेवार ने मिठाई लेने से इनकार करते हुए कहा था कि रानी ब्रिटेन की है, भारत देश की नहीं। उन्होंने मिठाई का पैकेट कचरे के डिब्बे में डाल दिया था।
विवेक के मुताबिक उन दिनों शालाओं में वंदे मातरम बोलने पर प्रतिबंध था। इस प्रतिबंध का डाॅ. हेडगेवार ने अपने स्तर पर विरोध करते हुए स्कूल के सभी बच्चों को एकजुट किया और गोपनीय तरीके से सफलतापूर्वक अभियान चलाया। जब ब्रिटिश स्कूल इंस्पेक्टर ने एक-एक क्लास का निरीक्षण किया, तो प्रत्येक कक्षा में उनके प्रवेश करते ही वंदेमातरम का नारा गूंजने लगा। बच्चों के इस रवैये से खिन्न ब्रिटिश निरीक्षक ने स्कूल को बंद करवा दिया। परेशान अभिभावकों ने किसी तरह छह- सात महीने के बाद स्कूल को खुलवाया, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों की एक शर्त थी कि बच्चों को माफी मांगना होगा। डाॅ. हेडगेवार ने माफी मांगने से इनकार कर दिया। तो अभिभावकों ने एक प्रयास किया कि माफी मांगने की बजाय बच्चे सिर्फ़ सहमति से सिर हिलाएंगे। बच्चों ने ऐसा ही किया और लगभग सात महीने से बंद स्कूल खुल सका। डाॅ. हेडगेवार कोलकाता के मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में डॉक्टरी की शिक्षा पूरी कर साल 1916 में कोलकाता से वापस नागपुर आ गए।
साल 1920 में डाॅ. हेडगेवार ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ली थी लेकिन कांग्रेस की नीतियों व राजनीति से उनका मोहभंग हो गया। वे कांग्रेस के स्वयंसेवक प्रभाग यानी हिंदुस्तानी सेवा दल, जिसे आज कांग्रेस सेवादल के नाम से जाना जाता है, की सदस्यता ली। गनोदवाले के अनुसार डाॅ. हेडगेवार शुरू से ही बाल गंगाधर तिलक, विनायक दामोदर सावरकर, बाबा राव सावरकर, श्री अरबिंदो और बीएस मुंजे के लेखन से काफी प्रभावित रहे। उनका मानना था कि हिंदुओं की संस्कृति और धार्मिक विरासत भारतीय राष्ट्रीयता का आधार होना चाहिए। विवेक ने बताया कि भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक व संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने एक बार कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वह वट वृक्ष है, जिसके फल हमें डेढ़ सौ साल के बाद दिखाई देंगे। अच्छी बात यह है कि इस वटवृक्ष के फल अभी से दिखाई देने लगे हैं।
मंडल अध्यक्ष अजय काले ने अपने संबोधन से बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारियां दी। कार्यक्रम का संचालन कर रहे सचिव चेतन दंडवते ने मुख्य अतिथि विवेक गनोदवाले के संबोधन का उल्लेख करते हुए कहा कि आरएसएस सामाजिक संगठनों से जो भी अपेक्षा रखता है, महाराष्ट्र मंडल गत कई वर्षों से उन अपेक्षाओं में खरा उतर रहा है। कार्यक्रम के अंत में सचेतक रविंद्र ठेंगड़ी ने आभार प्रदर्शन किया। तत्पश्चात मुख्य अतिथि गनोदवाले के साथ समस्त पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने लाॅन एरिया में महाराष्ट्रियन परंपरानुसार गुड़ी उभारी।