महाराष्ट्र मंडल में जयंती पर राजगुरु के बलिदान को किया गया नमन
2024-08-24 09:08 PM
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0- सांडर्स को गोली मारकर राजगुरु आसानी से भाग सकते थे लेकिन उन्होंने गिरफ्तारी देना ज्यादा जरूरी: देशपांडे
रायपुर। महाराष्ट्र मंडल ने शनिवार शाम को एक सादगीपूर्ण आयोजन में शिवराम हरि राजगुरु की जयंती मनाई गई और उनके बलिदान का स्मरण किया। इस मौके पर महाराष्ट्र मंडल की कार्यकारिणी के सदस्य एवं विभिन्न समितियों के अनेक पदाधिकारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ आजीवन सभासद एडवोकेट प्रशांत देशपांडे ने कहा कि जलियांवाला बाग सामूहिक नरसंहार के बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने तय कर लिया था कि इस नरसंहार का आदेश देने वाले जेपी सांडर्स का वध तो करना ही है। यहीं से देश को हर हाल में आजाद करने की भावना प्रबल हुई थी।शिवराम हरि राजगुरु इतने सटीक निशानेबाज थे कि उन्होंने जेपी सांडर्स को साइकिल की आड़ में बहुत दूर से दो आंखों के बीच पहली गोली मारी थी। इस गोली से वहीं उसकी मौत हो गई थी। हालांकि एक- दो गोलियां और उन्होंने सांडर्स के गिरने से पहले दागी थी। गोली चलाने के बाद जेपी सांडर्स से राजगुरु इतने दूर थे कि बड़ी आसानी से साइकिल से भाग सकते थे। उन्होंने अपनी गिरफ्तारी देना ज्यादा जरूरी समझा, ताकि लोगों को बता सकें कि आखिर सांडर्स को क्यों मारा गया।
एड्वोकेट देशपांडे ने कहा कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का प्रभाव इतना अधिक था कि ब्रिटिश सरकार उनको फांसी देने से सहमी हुई थी। उन्हें डर था कि अगर जेल के अंदर तय समय पर तीनों को फांसी दी गई, तो जेल से बाहर भीड़ बेकाबू हो सकती है। यही वजह है कि इतिहास की एकमात्र फांसी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 की शाम को दी गई। जबकि अलिखित नियम प्रातः काल में फांसी देने का है।
महाराष्ट्र मंडल के सचिव चेतन दंडवते ने बताया कि राजगुरु अल्प आयु में संस्कृत सीखने के लिए बनारस गए। उसके बाद वे कभी घर नहीं लौटे। चंद्रशेखर आजाद के देश की आजादी के लिए किए जा रहे आंदोलन से राजगुरु बेहद प्रभावित थे और उनकी हिंदुस्तान सोशलिस्ट पार्टी में वे शामिल हो गए। भगत सिंह और सुखदेव के साथ राजगुरु भी भरी असेंबली में पटाखा बम फोड़ने में सहभागी थे।