देश की पहली महिला जासूस... जिसने देश के लिए सबकुछ बलिदान कर दिया... अपने पति को भी नहीं बख्शा
2023-07-22 01:40 PM
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भारत की आजादी एक ऐसी संघर्ष और यातनाओं की दास्तां हैं, जिसके जितने परत खोले जाएं, नया ही जानने को मिलता है। आज हम भले ही आजाद देश के नागरिक हैं, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का हिस्सा कहलाते हैं, लेकिन इस आजादी को पाने के लिए जिन्होंने संघर्ष किया, उन्होंने कितनी यातनाएं बर्दाश्त की, यह जानने मात्र से भी रूहें कांप जाएंगी। देश को आजाद कराने नेताजी सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह, शहीद मंगल पांडेय सहित कई बड़े नाम हैं, जिन्होंने अपनी कुर्बानी दी है, तो कई ऐसे नायक हैं, जो गुमनामी के अंधेरे में खो गए। इनमें से एक नाम है नीरा आर्या का।
नीरा आर्या एक ऐसा नाम है, जिसने भारत की आजादी के लिये अपना सब कुछ बलिदान कर दिया। यहां तक कि नेताजी सुभाष चंद बोस की जान की सलामती के लिए उन्होंने अपने पति को भी नहीं बख्शा और उनकी हत्या कर दी। जिसके लिए नीरा को गिरफ्तार किया गया, हजारों यातनाएं दी गईं, यहां तक कि जेल में अंग्रेजों ने उनके स्तन तक काट दिए, लेकिन नीरा आर्य की देशभक्ति और वफादारी के सामने वो यातनाएं भी दम तोड़ दीं।
नीरा आर्या को देश की पहली महिला जासूस कहा जाता है। उन्होंने नेताजी की अगुवाई वाली 'आजाद हिन्द फौज' में शामिल होने के बाद अंग्रेजी हुकुमत की जासूसी शुरु कर दी थी। नेताजी को अंग्रेजों के हर कदम से सजग रखने के लिए नीरा ने अपनी जान तक की परवाह नहीं की। पति के अंग्रेजी हुकुमत में अफसर होने की वजह से नीरा को फायदा भी मिला।
बचपन से था देशप्रेम का जज्बा
नीरा का जन्म 5 मार्च, 1902 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेकड़ा में हुआ था। वो अपने इलाके के प्रतिष्ठित व्यवसायी सेठ छजूमल की बेटी थीं। जब नीरा आर्य का जन्म हुआ, उस समय भारत में अंग्रेजों का शासन था। कहते हैं, छोटी उम्र से ही नीरा ने अपने देश के लिए आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी थी। उन्होंने कई स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लिया, और देश के प्रति अपने समर्पण को प्रदर्शित किया।
झांसी रेजिमेंट का बन गई हिस्सा
कम उम्र में नीरा के पिता ने उनकी शादी 'श्रीकांत जयरंजन दास' से कर दी थी। आमतौर पर विवाहित होने के बावजूद लोगों की सोच बदल जाती है, लेकिन नीरा ने अपने रास्ते को नहीं छोड़ा। जहां नीरा अंग्रेजों से अपने देश की आजादी चाहती थीं, वहीं उनके पति ब्रिटिश सरकार के लिए काम कर रहे थे। क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान नीरा 'आजाद हिंद फौज' के संपर्क में आईं और 'झांसी रेजिमेंट' का हिस्सा बन गईं।
पति को मौत के घाट उतारा
अंग्रेजों ने नीरा के पति जयरंजन दास को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जासूसी करने और मौका मिलते ही उनकी हत्या करने की जिम्मेदारी थी। इसके लिए जयरंजन ने कई प्रयास भी किए लेकिन, उसे सफलता नहीं मिली। अपने पति के मिशन के बारे में जब मीरा को जानकारी हुई तो वो उनके खिलाफ हो गईं। एक दिन जब उनके पति ने सुभाष चंद्र बोस की हत्या करने का प्रयास किया, तो उन्होंने अपने पति को छुरा घोंप कर मार डाला, और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को बचा लिया। इसके लिए उन्हें अंग्रेजों ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
स्तन कट गए, पर जुबां नहीं खोली
नेताजी को लेकर नीरा से लगातार सवाल किए जाते, उनके ठिकाने जानने के लिए जेलर बोलता कि वो कहां हैं, तो नीरा हर बार मेरे दिल और दिमाग में हैं, कहकर जेलर को हकीकत नहीं बताती थी, जिससे गुस्से में आकर जेलर ने यह कहते हुए कि 'ठीक है हम तुम्हारे दिल को चीरकर निकालकर देखेंगे कि नेताजी कहां हैं, जेलर ने एक लोहार को इशारा किया। वो ब्रेस्ट रिपर लेकर आया और उनके दाएं स्तन को दबाकर काटने लगा। उनका एक स्तन काट दिया गया। इससे मिले दर्द ने सारी सीमाएं पार कर दी थीं। जेलर ने काफी बदसलूकी की और कहा कि दोबारा जुबान लड़ाई तो दोनों स्तन काट दिए जाएंगे।' इतने के बाद भी नीरा ने अपनी जुबां नहीं खोली। उन्होंने अपने जीवन पर एक किताब भी लिखी, जिसका नाम- मेरा जीवन संघर्ष है।
जमानत का लालच भी नहीं आया काम
इतिहासकारों ने मुताबिक अगर नीरा सुभाष चंद्र बोस के बारे में जानकारी दे देतीं तो उन्हें जमानत मिल जाती, लेकिन नीरा ने अपना मुंह नहीं खोला। भारत की स्वतंत्रता के बाद, नीरा जेल से बाहर निकली और हैदराबाद में फूल बेचकर अपना बाकी का जीवन बिताया। 1998 में उनका निधन हो गया था।