ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन में 7.93% की गिरावट
जलवायु अनुकूलता की दिशा में भारत की प्रगति
नई दिल्ली | 'भारत महात्मा गांधी की भूमि है, जिनका सतत विकास का दृष्टिकोण हमें बहुत प्रेरित करता है। हमने दिखाया है कि ग्रीन फ्यूचर (हरित भविष्य) और नेट जीरो जैसे प्रमुख सिद्धांतों को कैसे साकार किया जाता है।'
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान ने पृथ्वी पर जीवन के लिए गंभीर संकट पैदा कर दिया है। जिससे जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जीएचजी) को कम करने के लिए देशों को पेरिस समझौते के तहत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) प्रस्तुत करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसके जवाब में भारत ने 2021 में कॉप 26 के सम्मेलन में 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन हासिल करने का संकल्प लिया। भारत की चौथी द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट (बीयूआर-4) में 2019 की तुलना में 2020 में जीएचजी उत्सर्जन में 7.93% की कमी पर प्रकाश डाला गया है। यह एक सतत, जलवायु-आत्मनिर्भर भविष्य के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

21 मार्च, 1994 से प्रभावी यूएनएफसीसीसी का उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस सांद्रता को स्थिर करना और जलवायु परिवर्तन और दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन के लिए वित्त की पर्याप्त उपलब्धता पर वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना है।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप21) का 21वां सत्र 2015 में पेरिस में हुआ था, जहां 195 देशों ने पेरिस समझौते को अपनाया था। समझौते का उद्देश्य पूर्व-औद्योगिक स्तरों से ऊपर वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे तक सीमित करना है। साथ ही वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को जल्द से जल्द करने के प्रयासों को आगे बढ़ाना है। यह 4 नवंबर, 2016 को लागू हुआ, जिसके तहत देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों को रेखांकित करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) प्रस्तुत करने की आवश्यकता हुई।
प्रगति पर नजर रखने के लिए हर दो साल में भारत यूएनएफसीसीसी को द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट (बीयूआर) प्रस्तुत करता है। ये रिपोर्ट राष्ट्रीय जीएचजी सूची को अद्यतन करती हैं, शमन कार्यों का विवरण देती हैं और उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों सहित प्राप्त समर्थन पर प्रकाश डालती हैं।
भारत ने 30 दिसंबर 2024 को यूएनएफसीसीसी को अपनी चौथी द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट (बीयूआर-4) सौंपी। इस रिपोर्ट में 2019 के संबंध में 2020 में कुल जीएचजी उत्सर्जन में 7.93% की कमी दिखाई गई है। भूमि उपयोग, भूमि उपयोग परिवर्तन और वानिकी (एलयूएलयूसीएफ) को छोड़कर भारत का उत्सर्जन 2,959 मिलियन टन सीओ2ई (कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर, जीएचजी के प्रभाव को मापने का तरीका) था। एलयूएलयूसीएफ सहित शुद्ध उत्सर्जन 2,437 मिलियन टन सीओ2ई था। इसमें 75.66% उत्सर्जन के साथ ऊर्जा क्षेत्र सबसे बड़ा योगदानकर्ता था, अन्य भूमि उपयोग के साथ इसने लगभग 522 मिलियन टन सीओ2 को अलग कर लिया, जो देश के कुल उत्सर्जन के 22% को कम करने के बराबर था।
ये प्रयास समानता और पेरिस समझौते के सिद्धांतों के आधार पर अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों को संबोधित करते हुए जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
भारत ग्लोबल वार्मिंग में न्यूनतम योगदान देने के बावजूद, अपनी बड़ी आबादी और विकासात्मक आवश्यकताओं के कारण महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। देश अपनी अनूठी परिस्थितियों को पूरा करते हुए कम कार्बन उत्सर्जन और जलवायु आत्मनिर्भरता के निर्माण को लेकर प्रतिबद्ध है।
1850 और 2019 के बीच दुनिया की लगभग 17% आबादी होने के बावजूद बढ़ती वैश्विक जीएचजी उत्सर्जन में भारत की ऐतिहासिक हिस्सेदारी वार्षिक 4% है।
2019 में भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक प्राथमिक ऊर्जा खपत 28.7 गीगाजूल (जीजे) थी, जो विकसित और विकासशील दोनों देशों की तुलना में काफी कम है।
भारत अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के विकास के लिए घरेलू ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा तक पर्याप्त पहुंच सुनिश्चित करते हुए कम कार्बन वाले रास्ते अपनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
अपने विविध भूगोल के कारण भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। विकास, लाभ की सुरक्षा और भविष्य की वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए अनुकूलन रणनीतियां महत्वपूर्ण हैं।
भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक स्थायी रास्ता तैयार करने के लिए दीर्घकालिक निम्न ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन विकास रणनीतियां (एलटी-एलईडीएस) तैयार की है। भारत के एलटी-एलईडीएस में सात प्रमुख रणनीतिक परिवर्तन शामिल हैं। इनमें-
(i) विकास के अनुरूप बिजली प्रणालियों का कम कार्बन उत्सर्जन
(ii) एकीकृत, कुशल, समावेशी निम्न-कार्बन परिवहन प्रणाली विकसित करना
(iii) शहरी डिजाइन, इमारतों में ऊर्जा और सामग्री-दक्षता तथा टिकाऊ शहरीकरण में अनुकूलन को बढ़ावा देना
(iv) अर्थव्यवस्था में उत्सर्जन से विकास को अलग करने और एक कुशल, नवोन्मेषी कम उत्सर्जन वाली औद्योगिक प्रणाली के विकास को बढ़ावा देना
(v) कार्बन डाइऑक्साइड हटाना और इससे संबंधित इंजीनियरिंग समाधान
(vi) सामाजिक-आर्थिक और परितंत्र के अनुरूप वन और वनस्पति आवरण को बढ़ाना
(vii) निम्न-कार्बन उत्सर्जन के आर्थिक और वित्तीय पहलू और वर्ष 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को शुद्ध-शून्य तक पहुंचाना।