काशी की आत्मा में डूबा काव्य—अस्सी घाट पर शब्दों ने रचा आध्यात्मिक संसार
2026-04-08 07:32 AM
93
अस्सी घाट पर सजी काव्य की अलौकिक महफिल
वाराणसी| वाराणसी के अस्सी घाट पर मंगलवार की शाम एक बार फिर शब्दों की ऐसी सरिता बही, जिसमें काशी की आत्मा, आस्था और संस्कृति पूरी गरिमा के साथ प्रतिबिंबित हुई। सुबह-ए-बनारस आनंदन कानन की ओर से आयोजित काव्यार्चन की 55वीं कड़ी में रचनाकारों ने काशी को केंद्र में रखकर अपनी रचनाओं का पाठ किया। इस काव्य गोष्ठी ने न केवल श्रोताओं को भावविभोर किया, बल्कि काशी की आध्यात्मिक चेतना को भी जीवंत कर दिया।
अध्यक्षीय काव्यपाठ में काशी की महिमा का गुणगान
कवि सम्मेलन की अध्यक्षता नगर के वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पांडेय ‘काशीकेय’ ने की। अपने अध्यक्षीय काव्यपाठ में उन्होंने काशी की महिमा को समर्पित ग़ज़ल सुनाकर वातावरण को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया। उनकी पंक्तियां ‘कण कण में देखिए यहां शंकर का वास है, काशी की पुण्य भूमि पर शिव का उजास है...’ ने घाट पर बैठे हर श्रोता के मन में श्रद्धा की लहर पैदा कर दी। इसके बाद उन्होंने अपनी दूसरी ग़ज़ल ‘हम तो बस आपके सहारे हैं, आप ही से ये चांद तारे हैं...’ सुनाकर भावों की दिशा को बदलते हुए श्रोताओं को आत्मिक जुड़ाव का एहसास कराया।
सुषमा मिश्रा की रचनाओं में सामाजिक संदेश की गूंज
कार्यक्रम की शुरुआत में महिला रचनाकार सुषमा मिश्रा ने अपनी सशक्त रचनाओं से विशेष प्रशंसा बटोरी। उन्होंने धर्म के नाम पर हो रहे विभाजन को अपनी कविता का केंद्र बनाते हुए गहरी संवेदनशीलता से भरे शब्दों में संदेश दिया। उनकी पंक्तियां ‘एक भ्रम है धर्म विभाजन, धरती घर है अंबर आंगन, दोनों ही है मात-पिता, धर्म है कश्ती, जग नदिया...’ ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। उनकी दूसरी रचना ‘कोई रहीम, कोई राम बुलाए, कोई कहता वाहेगुरु, कोई कहता है यीशु, जाति-धर्म है मायाजाल, सबके लहू का रंग है लाल...’ ने सामाजिक समरसता का सशक्त संदेश दिया।
बनारस के प्रति प्रेम में डूबे जयशंकर सिंह के शब्द
वरिष्ठ रचनाकार जयशंकर सिंह ने अपनी रचनाओं के माध्यम से बनारस के प्रति अपने गहरे लगाव को अभिव्यक्त किया। उनकी पंक्तियां ‘मेरा मन है बनारस में, मेरी रुह बनारस में, मेरी चाह बनारस में, मेरी आह बनारस में...’ ने श्रोताओं के दिलों को छू लिया। उनकी दूसरी रचना में मां गंगा और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा स्पष्ट रूप से झलकी, जिसमें उन्होंने सुनाया ‘छलकाती हैं अमृत बूंदें, जहां पे गंगा मइया, बाबा भोले की नगरी है, भवसागर के खेवइया...।’
डॉ. प्रतापशंकर दूबे के मुक्तकों ने बदला माहौल
शहर में प्रतापी शायर के रूप में ख्यात डॉ. प्रतापशंकर दूबे ने अपने मुक्तकों और ग़ज़लों से कार्यक्रम में एक नया रंग भर दिया। उनका मुक्तक ‘बस अपना ग़म दिखाई दे रहा है, हमारा कम दिखाई दे रहा है, जो मेरी आंख में ठहरे हैं आंसू, उन्हें शबनम दिखाई दे रहा है।’ ने भावनाओं की गहराई को उजागर किया। वहीं उनकी ग़ज़ल ‘भावनाओं में बह बह के हम सारे रिश्ते निभाते रहे, ज़ख़्म उनसे मिले जो हमें हम उन्हीं से छिपाते रहे...’ ने रिश्तों की नाजुकता और संवेदनशीलता को बखूबी बयान किया।
संचालन और गरिमामयी उपस्थिति ने बढ़ाया आयोजन का मान
इस काव्य सत्र का संचालन अरविंद मिश्र ‘हर्ष’ ने किया, जिन्होंने पूरे कार्यक्रम को सधे हुए अंदाज में आगे बढ़ाया। इस अवसर पर डॉ. जयप्रकाश मिश्र, पं. सूर्यप्रकाश मिश्र, राजलक्ष्मी मिश्रा, ऋतु दीक्षित, जगदीश्वरी चौबे, सूर्यकांत त्रिपाठी, बीना त्रिपाठी, परमहंस तिवारी, अनु मिश्रा, प्रकाश मिर्जापुरी, प्रो. वत्सला श्रीवास्तव, डॉ. नागेश शांडिल्य, बालकृष्ण दास गुजराती, जया टंडन और डॉ. महेंद्र तिवारी ‘अलंकार’ सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
शब्दों में बसी काशी, भावों में बहती आस्था
अस्सी घाट पर आयोजित यह काव्य गोष्ठी केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि यह काशी की आत्मा, उसकी परंपरा और उसकी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव बन गई। यहां हर रचना में कहीं न कहीं काशी की महिमा, गंगा की पवित्रता और शिव की उपस्थिति का एहसास हुआ, जिसने इस आयोजन को एक अविस्मरणीय अनुभव बना दिया।