रचना से संवाद, समाज से सरोकार—अस्सी घाट पर गूंजा काव्य का 59वां सत्र
2026-05-06 09:55 AM
29
वाराणसी|| वाराणसी की सांस्कृतिक धड़कनों में मंगलवार की शाम एक बार फिर काव्य की मधुर तरंगें गूंजीं। अस्सी घाट स्थित सुबह-ए-बनारस आनंद कानन के मंच पर काव्य प्रकल्प के अंतर्गत काव्यार्चन के 59वें सत्र का आयोजन हुआ, जो काव्य साहित्य की विविधता और संवेदनशीलता को समर्पित रहा। इस सत्र में जहां वरिष्ठ रचनाकारों की अनुभवी वाणी ने गहराई दी, वहीं उदीयमान कवियों की ताजगी ने वातावरण को जीवंत बना दिया।
अध्यक्षीय काव्य पाठ: संवेदना और संदेश का संगम
कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी के वरिष्ठ गीतकार पंडित सूर्य प्रकाश मिश्रा ने की। अपने अध्यक्षीय काव्य पाठ में उन्होंने सहज शब्दों के माध्यम से समाज को गहन संदेश दिए। उनका पहला गीत रचना और सृजन की आत्मा से संवाद करता नजर आया—'रचना तुम पत्थर मत बनना, वाणी बनना स्पंदन की, साधारण अक्षर मत बनना...'। इसके बाद उन्होंने जीवन की चुनौतियों से जूझने की प्रेरणा देते हुए दूसरा गीत सुनाया—'हे चिरंतन पथिक न्यारे, थक गए क्यों पग तुम्हारे, आस्था की सीढ़ियों तक, चुक गए संकल्प सारे...'। उनके शब्दों में जीवन दर्शन और आस्था की शक्ति का सशक्त प्रतिबिंब दिखाई दिया।
संचालन में सम्मोहन, प्रस्तुति में विविधता
नगर की वरिष्ठ रंगधर्मी एवं कवयित्री राजलक्ष्मी मिश्रा 'मन' के सम्मोहक संचालन ने पूरे सत्र को एक विशेष लय प्रदान की। संचालन के साथ-साथ उन्होंने अपनी भावपूर्ण रचनाओं से भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। उनकी पंक्तियां—'कौन कहता है कि दौलत से ही जमाना है, यहां तो खाक में भी मोतियों का दाना है...'—ने जीवन के गहरे सत्य को सहजता से प्रस्तुत किया।
उदीयमान स्वर: आध्यात्म और प्रेम की अभिव्यक्ति
सत्र की शुरुआत उदीयमान रचनाकार विदुषी सहाना के काव्य पाठ से हुई। उन्होंने आध्यात्मिक भावभूमि से अपनी प्रस्तुति का आरंभ किया—'विद्वान था प्रकांड वो, विधान सारे जानता था, ब्राह्मण था ज्ञानी वो, त्रिलोचन को मानता था...'। इसके पश्चात उन्होंने प्रेम की पवित्रता को रेखांकित करते हुए कहा—'जब नयन से मिले तेरी दृष्टि प्रिये, यूं लगे थम गई सारी सृष्टि प्रिये...'। उनकी रचनाओं में भावनाओं की कोमलता और अभिव्यक्ति की गहराई स्पष्ट झलकी।
युवा चेतना: सामाजिक सरोकारों की मुखर अभिव्यक्ति
नगर के युवा रचनाकार मृत्युंजय त्रिपाठी ‘मलंग’ ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया। उनकी कविताओं में बेरोजगारी की पीड़ा और समाज की विडंबनाओं का यथार्थ चित्रण सामने आया। उन्होंने कहा—'डिग्री वाला वो कागज अब, बस रद्दी ही नजर आता है, चूल्हे की ठंडी राख देख, आंखों में धुआं भर जाता है।' उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।
संगठन और सहभागिता: साहित्यिक ऊर्जा का विस्तार
सुबह-ए-बनारस आनंद कानन के संस्थापक सचिव डॉ. रत्नेश वर्मा के संयोजन में आयोजित इस सत्र में आगंतुकों का स्वागत डॉ. नागेश शांडिल्य ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन एडवोकेट रुद्रनाथ त्रिपाठी ‘पुंज’ ने किया। इस अवसर पर शहर के अनेक साहित्यप्रेमी और रचनाकारों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनमें डॉ. ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'प्रकाश मिर्ज़ापुरी', प्रियानाथ पांडेय, गिरीश पांडेय ‘काशिकेय’, डॉ. महेंद्र तिवारी ‘अलंकार’, प्रो. वत्सला श्रीवास्तव, डॉ. प्रतापशंकर दूबे, अरुण द्विवेदी, राजेश द्विवेदी, जगदीश्वरी चौबे, प्रियंका अग्निहोत्री 'गीत', ऋतु दीक्षित, अनु मिश्रा, जया टंडन, डॉ. अंजना त्रिपाठी, पूनम गुप्ता, विजयचंद्र त्रिपाठी, विजय उपाध्याय, अखलाक खान ‘भारतीय’, परमहंस तिवारी ‘परम’, आनंदकृष्ण ‘मासूम’, टीका राम आचार्य, विजय मिश्र बुद्धिहीन, बालकृष्ण गुजराती, संतोष प्रीत और बुद्धदेव तिवारी समेत अनेक साहित्य साधक शामिल रहे।
काव्य की ऊर्जा से जीवंत हुई सुबह
काव्यार्चन का यह 59वां सत्र केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि शब्दों के माध्यम से समाज, संवेदना और सृजन की यात्रा का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। अस्सी घाट की इस सुबह ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि काशी की सांस्कृतिक चेतना में काव्य आज भी उतनी ही गहराई से प्रवाहित है, जितनी सदियों पहले थी।