केवल तन तपाने से नहीं, भेद-विज्ञान और सम्यक श्रद्धा से होती है आत्म-कल्याण की प्राप्ति: मुनि श्री आगम सागर जी
रायपुर। श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर (मालवीय रोड) एवं श्री दिगंबर जैन आदीश्वरधाम नवोदय तीर्थ समयोपदेश वर्षायोग 2026 समिति के तत्वावधान में रायपुर में परम पूज्य मुनिश्री ससंघ के अलौकिक सानिध्य में धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला निरंतर जारी है। इसी क्रम में 2 सितंबर 2026 का दिन अपार भक्ति, ध्यान और स्वाध्याय के वातावरण में भव्यता के साथ संपन्न हुआ।
समयोपदेश वर्षायोग के अध्यक्ष नरेंद्र जैन गुरु कृपा, भरत जैन भोरावत, प्रभात जैन, सनत जैन, सचिव राजेश रज्जन जैन ने संयुक्त रूप से बताया कि आज दिन का शुभारंभ प्रातः काल मूलनायक भगवान के पावन अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ हुआ। मूलनायक भगवान को एवं मूलनायक भगवान के समक्ष शांतिधारा करने का परम सौभाग्य त्रिकाल चौबीसी में प्रतिमा जी विराजमान करने का सौभाग्य प्राप्त करने वाले बड़जात्या परिवार से राजकुमार जी, विनोद जी, दिलीप जी, रासु जी एवं संजना जैन ने मूलनायक भगवान का अभिषेक व शांतिधारा कर महान पुण्य का अर्जन किया।
मुनिश्री ससंघ की आहारचर्या जैन समाज के विभिन्न पुण्यार्जक परिवारों के निज आवास एवं परिसरों में संपन्न हुई। जिसमें मुनि 108 श्री आगम सागर जी महाराज का आहारदान कराने का सौभाग्य श्रीमती मंजूदेवी कैलाशचंद्र एवं श्रीमती अर्चना विशाल पंड्या (गोल बाजार) को प्राप्त हुआ। मुनि 108 श्री पुनीत सागर जी महाराज की आहारचर्या रोशनी दीदी एवं शौर्य दीदी (बाबूलाल टॉकीज परिवार, मंदिर कार्यालय के सामने) के यहाँ संपन्न हुई।
एलक श्री धैर्य सागर जी महाराज को आहारदान कराने का सौभाग्य श्रीमती प्रज्ञा माधव जैन (जैन बाड़ा) को मिला। एलक श्री स्वागत सागर जी महाराज का आहारदान श्रीमती पुष्पादेवी बंशीलाल जैन (जैन बाड़ा) के यहाँ भक्तिभाव से संपन्न हुआ।
साथ ही आज धर्मसभा में पूज्य मुनि 108 श्री आगम सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को 'तत्त्वार्थ सूत्र' एवं 'छह ढाला' ग्रंथों का स्वाध्याय कराया। तत्पश्चात अपनी ओजस्वी मंगल देशना में मुनिश्री ने आत्मा और अनात्मा के भेद-विज्ञान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो लोग केवल बाह्य भेष धारण कर शारीरिक तपस्या में लीन रहते हैं, परंतु जिन्हें आत्मा का वास्तविक बोध नहीं है, वे केवल अपने शरीर को तपा रहे हैं। बिना आत्म-ज्ञान के कठिन तपस्या से भी मुक्ति की प्राप्ति संभव नहीं है।
मुनिश्री ने प्रवचन के मुख्य सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए कहा कि जिस जीव को यह विवेक जागृत हो जाता है कि आत्म-कल्याण के लिए किस मार्ग पर चलना है और जिसे आत्मा व अनात्मा का भेद समझ आ जाता है, उसे विशुद्ध पुण्य और सम्यक ज्ञान की प्राप्ति होती है। जैन धर्म की नींव सत्य, विश्वास और सम्यक दर्शन पर टिकी है। जिन लोगों का मस्तक या श्रद्धा कहीं भी अनायतन में झुक जाती है, वे आत्मा के वास्तविक स्वरूप से वंचित रह जाते हैं।
संसारी अवस्था में आत्मा अकेली नहीं रहती, बल्कि पूर्व कृत कर्मों के कारण कर्म-बंध से जुड़ी रहती है। जीव को प्राप्त होने वाला शरीर, जीवन और भौतिक सुविधाएं उसके कर्मों का ही फल हैं। शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अजर-अमर है। जो साधु या व्यक्ति ख्याति, पूजा, प्रतिष्ठा और सांसारिक लाभ की कामना में लगा रहता है, उसे आत्मा और अनात्मा का सही ज्ञान नहीं हो सकता।
सकल दिगंबर जैन समाज एवं समयोपदेश वर्षायोग समिति ने सभी पुण्यार्जक परिवारों के पुण्य की भावभीनी अनुमोदना की है। समिति ने रायपुर की समस्त धर्मानुरागी जनता से प्रतिदिन सपरिवार पधारकर मुनिश्री के दिव्य दर्शन, पूजन, स्वाध्याय एवं देशना का लाभ उठाने का भावपूर्ण आमंत्रण दिया है।