रायपुर

बिन परिचय पत्र निकले अयोध्या जाने... 16 किमी का सफर तय किया पैदल

कैलाश राव राउत, समाजसेवी

मेरे पिताजी स्व. गणेश राव राउत संघ परिवार और हिंदू धर्म आयोजनों से जुड़े थे, इसलिए बचपन से हिंदूत्व की भावना मेरे अंदर थी। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के आह्वान पर 6 दिसंबर 1992 को कार सेवा के लिए स्व.नरेश मिश्रा, पं. मदन मोहन चौबे के नेतृत्व में मैंने अपने युवा साथियों अशोक राव, दिपक बारकघे, मन्टू तलरेजा, अमित मिश्रा, गोविंद सोनी, महेश साहू के साथ अयोध्या जाने की योजना बनाई। इस समय अयोध्या जाने वाले कार सेवकों को संघ कार्यालय से एक परिचय पत्र जारी किया जाता था। हम सभी साथी जब संघ कार्यालय पहुंचे तो हमें यह कहकर परिचय पत्र नहीं दिया गया कि अयोध्या में अब काफी भीड़ हो चुकी है। इसलिए अब यहां से कोई कार सेवक नहीं जाएगा। लेकिन हमने अयोध्या जाने का मन बना लिया था, इसलिए हम परिचय पत्र के बिना ही 4 दिसंबर को सारनाथ एक्सप्रेस में चढ़ गए।

जैसे ही हमारे ट्रेन बिलासपुर पहुंची तो वहां हमें बिना परिचय पत्र के देख स्थानीय संघ के कार्यकर्ताओं ने परिचय पत्र प्रदान किया। दूसरे दिन 5 दिसंबर को रात 8 बजे के आसपास हम लोग फैजाबाद पहुंचे। वहां एक धर्मशाला में हमें भंडारा का प्रसाद मिला। रात को भोजन के बाद हम लोग सो गए। रात में पं. मदन मोहन चौबे जी फैजाबाद में टहलने के लिए निकले तो उन्हें सूचना मिली कि उनके साथ आए कारसेवकों को वहीं फैजाबाद में ही रोकना है। इसकी सूचना उन्होंने हम सब लोगों को दी। लेकिन हम तो अयोध्या जाने का मन बना चुके थे। हम सभी युवा साथी रात को ढाई बजे उठे और धर्मशाला से बाहर आए। हम लोगों ने फैजाबाद से अयोध्या तक 16 किमी की यात्रा पैदल निकल पड़े।

दूसरे दिन सुबह 8 बजे हम कारसेवक पुरम पहुंचे। सुबह 10 बजे सरयू नदी में स्नान कर हम लोग 11 बजे मंदिर परिसर पहुंचे। मंच पर वरिष्ठ नेताओं का भाषण सुना। इसी दौरान कुछ लोगों ने गुंबद में चढ़कर केसरिया ध्वज फहरा दिया। चारों ओर से सुरक्षाबलों के ऊपर पथराव शुरू हो गया। इसी बीच एक चमत्कार हुआ। गुंबद में फहराया गया ध्वज नीचे गिर रहा था, तभी एक वानर ने उस ध्वज को थाम लिया और गुंबद के ऊपर जाकर बैठ गया।

लोगों की भगदड़ के बीच उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा गुंबद के अंदर जो मराठी माषी कारसेवक थे, उनसे गुंबद को नुकसान नहीं पहुंचाने की बात कह रही थी। कारसेवकों ने उन्हें मराठी में ही कहा कि आप हमें अपना काम करने दें। दोपहर 1 बजे से पहले पहला ढांचा ध्वस्त होने के बाद शाम 5 बजे तक तीनों ढांचा ध्वस्त हो गया। वहां मौजूद लोगों ने राम नाम सत्य है, .... ढांचा ध्वस्त है के नारे लगाए। इसके बाद हमने अस्थाई मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा की। मेरे साथी अशोक राव ने इस कलंक के ध्वस्त होने के बाद अपना मुंडन करवा लिया। सात दिसंबर को हम सभी गर्व के साथ फैजाबाद से वाराणसी होते हुए 9 दिसंबर को रायपुर पहुंचे।