'अनादि मैं, अनंत मैं’ में नजर आई वीर सावरकर की शौर्य गौरवगाथा
2025-02-26 10:19 PM
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- महाराष्ट्र मंडल के संत ज्ञानेश्वर सभागृह में कटनी के कलाकारों ने हर उम्र के सावरकर को किया जीवंत
रायपुर। आज के युवाओं को कलम छोड़कर बंदूक थाम लेनी चाहिए। शिक्षा के स्कूल भरें न भरें, सैनिक स्कूल हमेशा भरे होने चाहिए। राष्ट्र की आजादी के लिए 10 हजार युवा हाथों में बंदूक लेकर, सिर पर कफन बांधकर निकल पड़े, तो ब्रिटिश हुकूमत को भी लौटने को लेकर सोचना पड़ जाए। स्वतंत्र वीर विनायक दामोदर सावरकर के की पुण्यतिथि पर महाराष्ट्र मंडल के संत ज्ञानेश्वर सभागृह में कटनी के कलाकारों द्वारा हिम्मत गोस्वामी के निर्देशन में मंचित किए गए नाटक 'अनादि मैं अनंत मैं' के दौरान इस दृश्य ने दर्शकों को जोश से भर दिया।

हिंदू महासभा में स्वतंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर के इस संबोधन को 'अनादि मैं, अनंत मैं' बड़ी संजीदगी से दिखाया गया। एक अन्य दृश्य में सावरकर अंडमान निकोबार की सेल्यूलर जेल में मौत से रूबरू होते हैं और कहते हैं 'क्यों मेरे सामने बार- बार आ जाते हो, तुम्हें देखकर मैं डरता नहीं बल्कि मुझे तो हंसी आती है।' विनायक दामोदर सावरकर को यूं ही वीर नहीं कहा जाता। इस दृश्य में ऋतिक सेठिया ने अपने बेहतरीन अभिनय से सावरकर की निर्भिकता, उनके अदम्य साहस को मंच पर जीवंत किया। ऐसे एक नहीं, अनेक दृश्य 'अनादि मैं अनंत मैं' नाटक के दौरान दर्शकों को अपनी जगह से हिलने नहीं देते, बल्कि सोचने पर मजबूर करते हैं कि कितने भयंकर संघर्ष, यातनाओं और त्रासदियों के बाद हमें आजादी मिली है और इसे लेकर हम कितने संजीदा हैं।

विंग्स सोसाइटी फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स कल्चरल समिति कटनी मध्य प्रदेश के कलाकारों की प्रस्तुति 'अनादि मैं अनंत मैं’ मूल रूप से वीर सावरकर के जीवन में घटित कुछ प्रमुख घटनाओं का संग्रह है। इसे एक तरह से उनकी जीवनी कहा जा सकता है। नाटक के मूल लेखक माधव खाडिलकर हैं। हिंदी मैं इस का अनुवाद इंदौर रंगमंच के वरिष्ठ नाट्य निर्देशक राजन देशमुख ने किया है। नाटक के माध्यम से वीर सावरकर के जीवन का और उनके जीवन से निकलने वाले भाव का सबसे सटीक विश्लेषण किया गया है।

नाटक शुरू होने से पहले बतौर मुख्य अतिथि भाजपा आईटी सेल प्रमुख दीपक म्हस्के ने मां सरस्वती के फोटो के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया। म्हस्के ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि आज के परिदृश्य को देखें तो ऐसा लगता है कि सावरकर को पुनः स्मरण करने और उनकी कहानी को घर- घर तक पहुंचाने की जरूरत है।सावरकर के जीवन से मिली शिक्षा को हर भारतीय तक पहुंचाने का सबसे उचित माध्यम यह नाटक है। वीर सावरकर का जीवन भारत के इतिहास का स्वर्णिम पृष्ट है, जिसे न केवल छुपा कर रखा गया, बल्कि सामान्य भारतीयों को सावरकर जी के विषय में भ्रमित किया गया।

मंच पर:-
नृत्य पर- ज्ञानेश्वरी नायडू
हनी गुप्ता- बाल्य सावरकर
ऋतिक सेठिया - युवा सावरकर
आरवीएस नायडू - स्वर्गीय सावरकर
शेरीन मसीह - निवेदक 2 / माई
मयंक वंशकार - निवेदक 1, मदन लाल ढींगरा
राहुल बहरोलिया- डेविड बारी
विशाल स्वामी - अधिकारी बाबू
देवा बंसल - मृत्यु
मनोज खरे - शिक्षक
राज सोनी - निवेदक 3
कुणाल - निवेदक 4
कार्तिक -क्रांतिकारी
राजू बुंदेला- चाफेकर बंधु
आकर्ष असाठी- चाफेकर बंधु
विश्वराज सिंह -कर्नल वायली
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मंच से परे
नाटक के लेखक - माधव खाडिलकर
हिंदी अनुवाद- राजन देशमुख
सेट- सुरेंद्र कुशवाहा / राजू बुंदेला
संगीत- राहुल बहरोलिया / सुरेंद्र कुशवाहा
कॉस्ट्यूम -हिम्मत गोस्वामी
प्रॉपर्टी -शेरीने मसीह
पोस्टर -सुरेश कुशवाहा
प्रकाश -अंकित वर्मन
विंग्स थिएटर मीडिया प्रभारी- सुशील मिश्रा
परिकल्पना और निर्देशन -हिम्मत गोस्वामी