भरत और राम के प्रेम का वर्णन कर भावुक हुई अपर्णा
2025-04-02 09:44 AM
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रायपुर। प्रभु श्रीराम के प्रति भरत के प्रेम, समर्पण और विश्वास का वर्णन करते हुए अपर्णा मोघे ने कहा कि पिता के एक आदेश को शिरोधार्य कर जहां राम ने स्वयं को जंगल का राजा सहर्ष स्वीकार कर लिया, वहीं दूसरी ओर जब भरत को यह पता चला कि उनके लिए माता कैकई ने अयोध्या का राजसिंहासन मांगा है, तो भाई के प्रेम में भरत ने बिना विलंब किए पूरी अयोध्या का त्याग कर राम की खोज में जंगल जाने का फैसला ले लिया। प्रभु राम के प्रति भरत के प्रेम का वर्णन करते हुए अपर्णा काफी भावुक हो गई। उन्होंने कहा कि भरत जैसा प्रेम करने वाला भाई सभी को बनना चाहिए।
महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान अपर्णा मोघे ने भरत के चरित्र की व्याख्या की। अपर्णा ने बताया कि जब माता कैकई ने राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के सिंहासन राजा दशरथ से मांगा तो उस समय भरत और शत्रुघ्न अपने नाना के घर प्रवास पर थे। राम के विरोग में दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए। तब भरत को अयोध्या बुलवाया गया। अयोध्या पहुंचने पर भरत को राम के वनवास गमन से लेकर दशरथ के प्राण त्यागने तक की घटना बताई गई। इस घटना को सुनने के बाद भरत अपनी माता पर नाराज हुए और उन्होंने राम की खोज के लिए वन जाने और अयोध्या का त्याग करने का मन बना लिया। राम के प्रति भरत का स्नेह देख तीनों माताएं करूणामयी हो गई। और भरत के साथ जाने का फैसला लिया।
राम की खोज में निकले भरत को सर्वप्रथम निषाद राज से भेंट हुई। निषाद राज ने खुद को शुद्र और राम का सेवक बताया। इस पर भरत ने उनसे कहा कि आप भैया राम के मित्र है, आपको राम ने गले लगाया। आपने भैया को सरयु पार कराया। तो आप शुद्र कैसे हो सकते है। आप खुद को छोटा न समझिए। राम ने जिसे अपनाया वह सब मेरे लिए भैया राम के समान है। अपर्णा ने कहा कि आज के युग में भाई-भाई के बीच ऐसा प्रेम बना रहे यह बेहद जरूरी है। हमें रामायण में भरत के पात्र से प्रेम, समर्पण और अपनों पर विश्वास की सीख मिलती है।