अनुपम धैर्य, त्याग, समर्पण और ममता की प्रतिमूर्ति है माता सुमित्राः शताब्दी पांडे
2025-04-02 09:45 AM
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रायपुर। महाराष्ट्र मंडल ने आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान मंडल की वरिष्ठ सदस्य शताब्दी पांडे ने मंडल की आध्यात्मिक समिति को धन्यवाद देते हुए कहा कि आपने रामायण के पात्रों पर चर्चा का आयोजन किया इसके माध्यम से मुझे भी एक बार फिर रामायण के पात्रों का अध्ययन करने का सौभाग्य मिला। मैंने माता सुमित्रा के जीवन दर्शन को पढ़ा। यथा नामो तथा गुणाः.... सुमि यानी सुंदर और त्रा यानी त्राण अर्थात् कष्टों को तारणे वाली।
शताब्दी पांडे ने आगे कहा कि बचपन से शुद्ध सात्विक और सदगुणी थी माता सुमित्रा। उनके जीवन दर्शन में धैर्य, त्याग, प्रेम और पावनता परिलक्षित होता है। परिवार पर विपत्ति, बड़ों की सेवा, महल का एकाकीपन के बीच सुमित्रा का नाम छूट जाता है। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का स्नान, श्रृंगार, भोग माता सुमित्रा ही करती थी। सुमित्रा इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं बल्कि नवीन चेतना से सुसम्पन्न नारी है। वह एक आदर्श मां के रूप में लक्ष्मण को राम की सेवा के लिए प्रेरित करती है। सुमित्रा संसार की ऐसी मां थी, जिनकी इच्छा थी कि उनका पुत्र राजा नहीं अपने भाई और भगवान श्रीराम का सेवक बने। अब राम तुम्हारे पिता और जानकी तुम्हारी माता है। उनकी सेवा ही तुम्हारा परम धर्म है।
शताब्दी ने बताया कि वनगमन के पूर्व माता सुमित्रा ने पुत्र लक्ष्मण से कहा कि वनगमन के लिए दुखी मत होना कि तुम राजभवन का त्याग कर रहे है। तुम्हें तो वह सबकुछ मिल रहा है, जिसके लिए ऋषि मुनि बरसों तक तपस्या करते है। तुम शेषनाग का अवतार हो, और तुम्हारे ही फन पर यह धरती विद्यमान है। धरती पर बढ़ते पाप का नाश करने के लिए श्रीराम वन जा रहे है। प्रतिकूलता को अनुकुलता में बदलने की क्षमता सुमित्रा जी में थी। माता सुमित्रा ने अपने पुत्र को साक्षात् नारायण को समर्पित कर दिया।
उन्होंने बताया कि माता सुमित्रा अद्वितीय प्रबंधकीय गुण था। वह महल के समस्त प्रबंध देखती थी। दासियों की नियुक्ति, पूजा, दान, अन्य आयोजन का जिम्मा उन्हीं के पास था। जहां एक ओर महारानी कौशल्या राजा दशरथ की प्रिय पत्नी थी, वहीं दूसरी ओर माता सुमित्रा अपने गुण और व्यवहार के कारण आदरणीय पत्नी थी। मैं आज इस मंच से आप सभी से माता सुमित्रा के आचरण से कुछ सीखने का संकल्प लेने की अपील करती हूं।