दिव्य महाराष्ट्र मंडल

हर घर में मंथरा, स्‍वयं का विवेक जरूरी: अर्चना

रायपुर। हर घर में कान भरने वाले और आपकी सोच और विवेक को प्रभावित करने वाला कोई न कोई मंथरा जैसा पात्र जरूरी होता है। जिसकी वजह से आपके परिवार में कलह की स्थति बनी रहती है। जरूरत है तो सिर्फ आपको अपने जीवन में मंथरा जैसे पात्र की पहचान करने और उससे सावधान रहने की। हर कहीं सुनी गई बात सही नहीं होती। इतना विवेकवान तो आपको होना ही होगा तभी अपने जीवन में मंथरा निष्‍प्रभाव होगी। इस आशय के विचार अर्चना मुकादम ने कहे। अर्चना महाराष्‍ट्र मंडल के छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह में आध्‍यात्मिक समिति की ओर से जारी रामनवमी महोत्‍सव के चौथे दिन रामायण के पात्र मंथरा का विश्‍लेषण कर रहीं थीं।

मंथरा पर चर्चा करते हुए अर्चना ने कहा कि मंथरा का जन्म ही राम को वनवास भेजने के लिए हुआ था। रानी कैकेयी कैकेय राज्य के राजा अश्वपति की बेटी थीं। राजा अश्वपति का एक भाई वृहदश्रव था और उसकी बेटी थी राजकुमारी रेखा। जो बाद में मंथरा के नाम से जानी गई। वहीं लोमश रामायण में उल्लेखित है कि श्रीराम वनवास के बाद लोमश ऋषि अवध आये थे, तब मंथरा की कथा सुनाई थी। मंथरा भक्त प्रह्लाद के पुत्र विरोचन की पुत्री थी। जब विरोचन ने देवताओं पर विजय हासिल की तो देवताओं ने ब्राह्मण भिक्षु रूप धरा और उसकी आयु मांग ली। दैत्य बिना सरदार के हो गए. मंथरा की सहायता से दैत्यों ने देवताओं को हराया और तब देवता भगवान विष्णु की शरण में गये. फिर विष्णु की आज्ञा से इन्द्र ने वज्र से वार किया। मंथरा चिल्लाती हुई पृथ्वी पर गिरी तो कूबड़ निकल आया।

लोमश ऋषि के अनुसार मंथरा अपनी पीड़ा में विष्णु को कोसती रही लेकिन उसके अपनों ने भी उसे ही दोषी माना। भगवान विष्णु के अन्यायों के कारण उनसे बदला लेने की बात कहते हुए उसकी मृत्यु हुई, लेकिन बदला लेने की वासना के कारण वह अगले जन्म में कैकेयी की दासी बनी और विष्णु के अवतार राम के सुखमय जीवन को तबाह करने का कारण बनी।