दिव्य महाराष्ट्र मंडल

पंडित धनंजय शास्त्री वैद्य पहुंचे महाराष्ट्र मंडल, कार्यकारिणी और सदस्यों ने किया स्वागत

रायपुर। महाराष्ट्र मंडळ के नवनिर्मित भवन को देखने के लिए मुंबई के सुप्रसिद्ध पंडित धनंजय शास्त्री वैद्य यहां पहुंचे। उन्होंने महाराष्ट्र मंडळ भवन को फोर स्टार होटलों की सुविधाओं वाला अभूतपूर्व, खूबसूरत और मराठी भाषी समाज की एकता का प्रतीक बताया। 
 
उन्होंने रायपुर के अलावा मध्य भारत में मराठी भाषियों की एकता की प्रशंसा की और कहा कि यही कारण है कि यहां पर मराठी संस्कृति व परंपराएं जीवित हैं। मंडळ के पदाधिकारियों से चर्चा करते हुए पंडित धनंजय शास्त्री ने कहा कि जब महाराष्ट्र मंडल समूचे मध्य भारत का बहुत बड़ा प्रेरक स्थान है, तो यहां की दीवारों पर प्रथम मराठी शिलालेख, प्रथम मराठी ताम्रपत्र, प्रथम मराठी ग्रंथ की फोटो लगी होनी चाहिए। इससे हमारी भावी पीढ़ी गौरवान्वित हो मराठी भाषा के प्रति उनकी ललक बढ़े। 
 
चौबे कॉलोनी स्थित महाराष्ट्र मंडल में गुरुवार की दोपहर पहुंचे पंडित धनंजय का मंडळ अध्यक्ष अजय काले, उपाध्यक्ष श्याम सुंदर खंगन, सचिव चेतन दंडवते, मेस प्रभारी दीपक किरवईवाले, कामकाजी महिला वसति गृह प्रभारी नमिता शेष, दिव्यांग बालिका गृह प्रभारी आस्था काले, महिला प्रमुख विशाखा तोपखानेवाले, सह प्रमुख रश्मि गोवर्धन, पर्यावरण समिति के प्रभारी अभय भागवतकर, वरिष्ठ सदस्य दिलीप वरवंडकर, दीपक पात्रीकर, दिव्या पात्रीकर, शुभदा पांडे, अभिषेक बक्षी, बृहन्महाराष्ट्र मंडल के छत्तीसगढ़ प्रभारी सुबोध टोले, सचिंद्र देशमुख, किशोर गिरीभट्ट सहित कई पदाधिकारी व सदस्यों ने स्वागत किया। 
 
कौन है पंडित धनंजय शास्त्री वैद्य
मुंबई में अध्यात्म क्षेत्र में पंडित धनंजय शास्त्री एक सुप्रसिद्ध एवं प्रचलित नाम है। धनंजय शास्त्री ने माता और पिता की वेदों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ब्रह्मचारी जीवन का मार्ग चुना। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में पालघर जिले के वसई क्षेत्र में हुई। मुंबई में ही उन्होंने स्नातक और पुणे विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। घर का वातावरण आध्यात्म व भक्तिभाव से परिपूर्ण था, इसलिए धनंजय शास्त्री 11 वर्ष की आयु से ही वेदों की शिक्षा लेना शुरू कर चुके थे।
 
आगे की शिक्षा के लिए उन्होंने ओड़ीशा के जगन्नाथपुरी जाकर जगतगुरु शंकराचार्य महाराज से वेद-वेदांत, संस्कृत, व्याकरण की शिक्षा ली। लगभग तीन साल पहले उज्जैन कुंभ के दौरान द्वारका शारदा पीठ और बद्री ज्योतिष पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य  ने उन्हें ब्रह्मचर्य जीवन की शपथ दिलाई और उनका नाम बदलकर ब्रह्मचारी निरंजनानंद स्वामी रखा।