दिव्य महाराष्ट्र मंडल

महाराष्ट्र मंडल में "मराठी मोडी लिपि' की कक्षा शुरू

 0- 700 सालों तक मराठी की लिपि रही है मोडी, महाराष्ट्र में सन् 1950 तक शालाओं में भी पढ़ाई जाती रही 

रायपुर। महाराष्ट्र में प्राचीन समय से इस्तेमाल की जाने वाली ‘मोडी लिपि’ की कक्षाएं मंगलवार नौ सितंबर से श्रीमद् भागवत कथा प्रवचन खत्म होते ही रात आठ बजे से लगाई जा रहीं हैं। पहले ही दिन अनेक श्रद्धालुओं ने मंडल के छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह में लग रही कक्षा में शामिल होकर अपनी रुचि दिखाई है। महाराष्‍ट्र मंडल श्रीमद् भागवत कथा सुनाने के लिए मुंबई से पहुंचे धर्मसभा विद्वतसंघ श्रीश्री जगतगुरु शंकराचार्य पीठम के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रह्मचारी निरंजनानंद आचार्य वेदमूर्ति धनंजय शास्त्री वैद्य ने मोडी लिपि की क्‍लासेस लेनी शुरू कर दी है।
महाराष्‍ट्र मंडल के अध्‍यक्ष अजय मधुकर काले ने बताया कि मोडी लिपि अब विलुप्त होने के कगार पर है। सन् 1950 से पहले महाराष्ट्र के स्कूलों में मोडी लिपि पढ़ाई जाती थी। बदलते समय के साथ मोडी की जगह देवनागरी लिपि ने ले ली। महाराष्ट्र का गौरवशाली इतिहास आज भी इसी मोडी लिपि में छिपा है। महाराष्ट्रीयन परिवारों और मराठी जानने वालों को मोडी लिपि की फिर से जानने का मौका मिलने जा रहा है। 

क्या है मोडी लिपि
काले के अनुसार ‘मोडी’ भाषा नहीं बल्कि मराठी भाषा की एक लिपि है, जो सात सौ सालों तक महाराष्ट्र की राजभाषा रही है। यह लिपि यादव काल से चली आ रही है। देवगिरी के राजा रामदेव राय के प्रधान मंत्री हेमंद्री पंत ने सबसे पहले मोडी लिपि की खोज की थी। कहते हैं कि इस लिपि की प्रेरणा उनको सिंहल (श्रीलंका) देश से प्राप्त हुई थी। सन् 1230 में मोडी लिपि में पहली पुस्तक हेमाद्रि पंत द्वारा चतुर्वर्ग चिंतामणि लिखी गई थी। आज हमें फिर से मोडी लिपि जानने का मौका मिल रहा है, यह अवसर हमें चुकना नहीं चाहिए।