दिव्य महाराष्ट्र मंडल

परिवार का एक सदस्य लें नेत्रदान की जिम्मेदारीः विक्रम हिशीकर

रायपुर। नेत्रदान को महादान कहा गया है, क्योंकि एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो नेत्रहीन लोग इस दुनिया को देख सकते है। आपके परिजनों की आंखों और 30-40 सालों तक इस दुनिया को देख सकेगी। लेकिन किसी शोक संतप्त परिवार के बीच पहुंचकर नेत्रदान की अपील करना एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। हमें इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। उक्त बातें महाराष्ट्र मंडल के आजीवन सभासद और नेत्रदान प्रकल्प प्रभारी विक्रम हिशीकर ने कहीं।

विक्रम हिशीकर कहा कि नेत्रदान के लिए लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी है। घर पर शोक होने एक नियति है। ईश्वर की इस इच्छा के सामने हमसब नतमस्तक है। लेकिन किसी की मृत्यु के उपरांत उनके नेत्रदान से दो लोग इस दुनिया को देख सकते है। गम वाले माहौल के बीच हम यानी परिवारजन मुक्तिधाम में लकड़ी, पानी, वहां तक जाने के लिए गाड़ी की व्यवस्था की जिम्मा खुद से लेते है। ऐसे में परिवार के एक सदस्य को नेत्रदान कराने की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। परिवार का एक सदस्य भी इसकी जिम्मेदारी लेता हैं तो यह अपनी मृत परिजन को सच्ची श्रद्धांजलि देंगे।

विक्रम हिशीकर ने बताया कि अब तक वे 50 से अधिक लोगों के घर पहुंच तक मरणोपरांत नेत्रदान करा चुका है। महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले ने कहा कि नेत्रदान और रक्तदान आज से समय में सबसे बड़ा दान है। ऐसे में इसे लेकर हमें स्वतः आगे आना होगा। हमारी छोटी सी पहल दो नेत्रहीन को रोशनी देगी।