संगीतमय काकड़ आरती के समापन पर उत्सव जैसा माहौल.. तात्यापारा स्थित हनुमान मंदिर में पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
तात्यापारा स्थित हनुमान मंदिर में पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा लगातार हो रही भव्य, बढ़ रही श्रद्धालुओं की संख्या
रायपुर। कार्तिक मास के अंतिम दिन कलचुरी काल से प्रतिष्ठित प्राचीन हनुमान मंदिर तात्यापारा में सुमधुर संगीतमय काकड़ आरती की गई। अलसुबह की जाने वाली इस आरती के लिए परंपरानुसार सभी भक्त घर पर स्नान- ध्यान व पूजा करके मंदिर पहुंचे और लगभग घंटेभर भजन करने के बाद काकड़ आरती की।
इस अवसर पर विश्वास शेष, मनोहर शेवलीकर, कपिल कुसरे, निशा राहटगांवकर, अनिल गनोदवाले, अनिल ठोबंरे, रंजन मोड़क, सुमीत मोड़क, वैभव डांगे, राहुल खानखोजे, अशोक भाले, सतीश अग्रवाल, सौरभ देव, नंदकुमार लेले, अजय पोतदार, शरद देशपांडे, नवीन शेष, सुकृत गनोदवाले, वैभव कान्हे, शरद डांगे, मिलिंद कौडीसाव, विशाल डांगे, रिया खानखोज, श्याम शेष, संजीव बल्लाल, सुनील शेष सहित अनेक श्रद्धालु भक्तिभाव से भजन और काकड़ आरती करते दिखे। इन भक्तों का कार्तिक मासभर सुबह 5:30 बजे आने और इसी तरह भजन-कीर्तन और काकड़ आरती करने का क्रम जारी है।

काकड़ आरती की प्रथा कब और कैसे शुरू हुई, इसके बारे में एक पौराणिक कथा है। लोगों को भगाने वाले, डराने वाले महाक्रूर तारकासुर का वध भगवान शिव के पुत्र कार्तिक स्वामी ने किया था। इसी कार्य के लिए उनका जन्म कार्तिक माह में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि उन्हीं के नाम पर इस माह का नाम 'कार्तिक' पड़ा। शिव के इस महान पुत्र को नमन करते हुए हमारे जीवन में सदैव सुख समृद्धि और शांति बनी रहे इसलिए काकड़ आरती की प्रथा प्रचलित हुई।
ऐसा माना जाता है काकड़ आरती की रचना संत तुकाराम महाराज, संत रामदास और संत एकनाथ महाराज ने की थी। यह आरती कार्तिक महीने के शुक्ल एकादशी से त्रिपुरी पूर्णिमा तक हर रोज सुबह मंदिर में की जाती है। काकड़ आरती मतलब अलसुबह सूर्योदय के पहले भगवान की प्रार्थना से उन्हें जगाना महाराष्ट्र में लगभग सभी देवस्थानों विशेषत: पांडुरंग विट्ठल और दत्त मंदिर में विशेषकर यह आरती सुबह सूर्योदय के पहले होती है। इसमें एक प्रकार की बाती होती है, जिसे हम काकड़ कहते हैं। इसको जलाकर दीया के स्वरूप हम उससे आरती करते हैं।

कार्तिक मास की पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसका गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। भक्तगण भगवान शिव की आराधना में अनुष्ठानों में भाग लेते हैं और शांति, ज्ञान और आध्यात्मिक परिवर्तन के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। काकड़ आरती का समापन इसी दिन किया जाता है।
त्रिपुरासुर पर विजय: पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक शक्तिशाली राक्षस का वध किया था। त्रिपुरासुर के वध से सभी देवी-देवता प्रसन्न हुए और उन्होंने काशी (वाराणसी) में आकर दीप प्रज्जवलित कर यह उत्सव मनाया। इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है।