0- बस्तर में दशकों से आदिवासियों की नि:स्वार्थ सेवा करने वाले पद्मश्री डॉ. गोडबोले दंपती का महाराष्ट्र मंडल के साथ अनेक संस्थाओं ने किया सम्मान
रायपुर। राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के हाथों दो दिन पहले सम्मानित होने वाले डॉ. रामचंद्र त्र्यंबक गोडबोले और उनकी पत्नी डॉ. सुनीता रामचंद्र गोडबोले को गुरुवार की देर शाम महाराष्ट्र मंडल ने सम्मानित किया। साथ ही बृहन्महाराष्ट्र मंडल सहित कुछ अन्य संस्थाओं और लोगों ने भी उनका अभिनंदन किया। स्वातंत्र्य वीर सावरकर जयंती पर आयोजित बेहद गरिमामय आयोजन में विनायक दामोदर सावरकर पर आयोजित निबंध स्पर्धा के विजेताओं को पुरस्कृत भी किया गया। ‘मैं भी सावरकर’ फैंसी ड्रेस स्पर्धा में प्रतिभागी भी इस मौके पर प्रोत्साहित किए गए।

बस्तर में 37 वर्षों से दूरस्थ आदिवासियों की सेवा कर रहे पद्मश्री डॉ. रामचंद्र गोडबोले ने अपने प्रेरणास्पद भाषण में अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि वे बस्तर में पिछड़े, अनपढ़ आदिवासियों की सेवा करने के दौरान अनेक कष्टों को झेलने के बाद आज भी अपने जीवन को बस्तर की आनंद यात्रा के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा कि उनका सहायक चैतूराम उन्हें कुपोषण के बारे में भाषण देने ले गया था। वहां जाने के बाद पता चला कि यह तो नक्सलियों का कैंप है। वहां जाने से लेकर सुरक्षित लौटकर आने तक का वृतांत सुनाते हुए उन्होंने कहा कि नक्सलियों के बीच से लौटने के बाद उनका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया। उन्हें विश्वास हो गया कि जब वे दरिद्र मानव की सेवा कर रहे हैं, तो उनके साथ कुछ भी गलत नहीं हो सकता। यह भरोसा उन्हें उस समय आ गया था, जब बस्तर संभाग में नक्सलवाद चरम पर था। जबकि आज की स्थिति काफी बदल गई है।

पद्मश्री डॉ. रामचंद्र कहते हैं कि एक बार वे स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस में सवार होकर नारायणपुर से गुजर रहे थे। उन्होंने पास ही बैठे अखबार पढ़ रहे यात्री से उसका अखबार लिया, तो समाचार पत्र के पहले पेज की खबर थी, ‘नक्सली हमले से 25 जवान शहीद’। उन्होंने इस खबर पर अपने करीबी यात्री से चर्चा की, तो उसने नाराजगी से कहा कि चुपचाप समाचार पढ़ो और समाचार पत्र वापस करो। बस में हर एक यात्री सहमा हुआ था। ऐसे में नारायणपुर में शहीदों को अंतिम विदाई देने पहुंचे हजारों लोगों की भीड़ से जब उनकी बस गुजरी। उन्होंने शहीदों के शव सहित वहां का वातावरण देखा, तो एक बार लगा कि आखिर वे कहां आ गए हैं। फिर भी मानव सेवा को लेकर उनका ध्येय एक क्षण के लिए भी डिगा नहीं।
डॉ. गोडबोले 10 माह की बच्ची को बारसुर से रायपुर में डॉ. आंबेडकर हॉस्पिटल लाने और यहां डॉक्टर्स के अनुभव का जीवंत वर्णन करते हुए कहा कि शहरवासी और वनवासी के बीच का भेद खत्म होना ही चाहिए। हमें जिस मानवता और आत्मीयता की अपेक्षा शासन- प्रशासन से है, वैसी ही अपेक्षा आम नागरिकों से भी है। ऐसा कई बार होता है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर से रायपुर पहुंचा। बीमार आदिवासी का यहां इलाज नहीं हो पाता। लेकिन उसके परिवार के लिए भी सादे भोजन की व्यवस्था तक नहीं हो पाती। ऐसे समय बस्तर और रायपुर का फासला उसके अनुभव के आधार पर बढ़ जाता है। यही नहीं होना चाहिए।
*इन संस्थाओं ने किया सम्मान*
पद्मश्री डॉ. रामचंद्र गोडबोले और डॉ. सुनीता गोडबोले दंपती का सम्मान महाराष्ट्र मंडल की ओर से अध्यक्ष अजय काले, सचिव चेतन दंडवते, मुख्य समन्वयक श्याम सुंदर खंगन, कार्यकारिणी नमिता शेष, मालती मिश्रा, विशाखा तोपखानेवाले, आस्था काले, परितोष डोनगांवकर, निरंजन पंडित ने किया। बृहन्नमहाराष्ट्र मंडल की ओर से शेखर राव साहेब अमीन, छत्तीसगढ़ कार्यवाह सुबोध टोले ने किया। वहीं पर्यावरण प्रेमी शुभांगी- संजय आप्टे, शशिकांत पोड और अरुण भावे ने भी सम्मान किया। राज्यपाल के एडीसी ओम बाविसकर के माता-पिता अजय बाविसकर और कविता बाविसकर ने भी गोडबोले दंपती का सम्मान किया। महाराष्ट्र मंडल ने बाविसकर दंपती और गोडबोले दंपती के साथ आए वनवासी आश्रम के कार्यकर्ता चिंटू राम को भी सम्मानित किया।
*निबंध प्रतियोगिता के विजेता*
वीर सावरकर पर आयोजित निबंध और फैंसी ड्रेस स्पर्धा के विजेताओं को मंच से पुरस्कृत किया गया। युवा वर्ग से विजेता सुनीता जोशी, उप विजेता अनघा करकशे और वैष्णवी काले रहीं। बालक वर्ग से कृष्णराज गणेशा जाधव प्रथम और राधेराज गणेशा द्वितीय रहे। फैंसी ड़्रेस स्पर्धा में कृष्णराज विजेता रहे, जिन्हें पुरस्कृत किया गया।