दिव्य महाराष्ट्र मंडल

शिवाजी महाराज ने दक्षिण दिग्विजय की सामरिक गहराई से जीते 360 किले

0- महाराष्ट्र मंडल में दो दिवसीय कार्यशाला शुरू, भारतीय विद्या पारंगत पुणे के मोहिते ने छत्रपति शिवाजी पर दी अहम जानकारी 

रायपुर। छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज की स्थापना के लिए अपने राज्याभिषेक के बाद सन् 1676 से 1678 तक दक्षिण विजय के लिए ऐसी स्ट्रटीजिक डेप्थ (सामरिक गहराई) बनाई कि इन दो सालों में मराठा साम्राज्य तुंगभद्रा नदी से कावेरी तक फैल गया। अभियान की शुरुआत में शिवाजी महाराज के पास 50 किले थे, लेकिन इन दो सालों में शिवाजी महाराज ने 360 किलों में जीत हासिल की। सभी किले युद्ध में नहीं जीते गए, बल्कि कुछ किले रणनीति के साथ मराठा साम्राज्य में शामिल किए गए। महाराष्ट्र मंडल के छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह में ‘हिंदवी स्वराज्य से साम्राज्य तक’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के पहले दिन भारतीय विद्या पारंगण पुणे से पहुंचे विक्रम सिंह मोहिते ने इस आशय की जानकारी दी। 
 
 
मोहिते ने कहा कि छत्रपति शिवाजी का दक्षिण दिग्विजय (1676-1678), उनके जीवन की सबसे लंबी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विजय यात्रा थी। राज्याभिषेक के बाद स्वराज्य का विस्तार करने और मुगलों के खिलाफ अंतिम लड़ाई के लिए मजबूत आर्थिक-भौगोलिक आधार तैयार करने के लिए यह अभियान चलाया गया। इस महाअभियान की शुरुआत सन् 1676 को हुई। दक्षिण की ओर बढ़ते हुए, उन्होंने गोलकुंडा के सुल्तान कुतुबशाह के साथ एक ऐतिहासिक मैत्री संधि की। सुल्तान ने मराठों की बढ़ती ताकत से भयभीत होकर उन्हें भारी धन और तोपखाने की मदद दी। 
विक्रम सिंह मोहिते ने आगे बताया कि दक्षिण दिग्विजय अभियान के दौरान मराठा सेना आगे बढ़ते हुए कर्नाटक और तमिलनाडु के विस्तृत क्षेत्रों को अपने कब्जे में लिया। उन्होंने आदिलशाह से जींजी और वेल्लोर के अभेद्य किलों को जीत लिया। इससे मराठा साम्राज्य का राजकोष कई गुना बढ़ गया और दक्षिण में मुगलों के विस्तार को रोकने के लिए एक मजबूत मराठा सत्ता स्थापित हो गई। मोहिते ने समझाया कि राजा अपनी सल्‍तनत का होता लेकिन महाराजा तो राजाजों का भी राजा होता है। इसी तरह छत्रपति शिवाजी महाराजा थे। 
 
 
मोहिते के अनुसार उनका राज्‍याभिषेक हुआ था लेकिन असल में वह राज्‍य का नहीं राजा का अभ‍िषेक हुआ था, अनेकानेक दायित्‍व व कर्त्‍तव्‍य बोध के साथ। वहीं शिवाजी महाराज छत्रपति थे। छत्रपति का आशय राजा के सर पर छत्र का होना है लेकिन शिवाजी के संदर्भ में छत्रपति का मतलब प्रजा को अपनी छत्रछाया में लेने वाला होता है अर्थात सही मायनों में शिवाजी छत्रपति व महाराजा थे जिनका राजा अभिषेक हुआ था।  
 
कार्यशाला के मुख्‍य अतिथि राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के महानगर प्रचारक मनोज कश्‍यप ने कहा कि हिंदुस्‍तान में रहने वाला हिंदुस्‍तानी है, सनातनी है। यहीं शिवाजी जैसे पराक्रमी महाराज भी हैं, जिन्‍होंने हिंदवी स्‍वराज की स्‍थापना की। उनके बारे में जितनी भी जानकारी हासिल करो, कम है। ऐसे कार्यक्रम में शामिल होने वाले हर व्‍यक्ति को कॉपी-पेन लेकर बैठना चाहिए क्‍योंकि यहां ऐसी- ऐसी जानकारी और तथ्‍य बताए- दिखाए जाएंगे, जिसे आप दोबारा आसानी से देख, सुन या ढूंढ नहीं पाएंगे। इस तरह महाराष्ट्र मंडल में यह आयोजन प्रशंसनीय है। 
 
 
कार्यक्रम की अध्‍यक्षता कर रहे मंडल अध्‍यक्ष अजय मधुकर काले ने कहा कि छत्रपति श‍िवाजी महाराज को हमारे पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। ताकि अपने शुरुआती शैक्षणिक जीवन में ही बच्‍चे शिवाजी महाराज के बारे में आवश्‍यक जानकारी हासिल कर उनसे प्रेरित हो सकें। महाराष्‍ट्र मंडल गत चार वर्षों 19 फरवरी को शिवाजी जयंती और 6 जून को शिवाजी राज्‍याभिषेक दिवस समारोह का धूमधाम से आयोजन कर रहा है। वहीं प्रति माह 19 तारीख को शिवाजी महाराज की महाआरती के अभियान को भी अब चार साल होने को आए हैं। काले ने कहा कि महाराष्‍ट्र मंडल में शिवाजी महाराज से संबंधित कार्यक्रमों की बढ़ती संख्‍या को देखते हुए अब हमने अलग से छत्रपति शिवाजी महाराज कार्यक्रम आयोजन समिति गठित की है, जो सिर्फ शिवाजी महाराज से संबंधित कार्यक्रम ही आयोजित करेगी। यह कार्यशाला भी इसी नवगठित समिति ने आयोजित की है। इसमें बड़ी संख्‍या में युवा प्रतिभागियों के साथ- साथ हर आयु के लोग भी उपस्‍थ‍ित हैं। कार्यक्रम का संचालन छत्रपति शिवाजी महाराज कार्यक्रम आयोजन समिति के पुरुष अध्‍यक्ष गणेशा जाधव पाटिल और महिला प्रमुख रीना रितेश बाबर  ने किया। समिति के समन्‍वयक अभि‍षेक बक्षी ने आभार प्रदर्शन किया।