दिव्य महाराष्ट्र मंडल

मराठा योद्धाओं की थी दोहरी भूमिका, चार माह किसान और आठ माह योद्धा

- शिवाजी महाराज की गोरिल्ला युद्ध नीति से मुगलों को किया था पस्त

रायपुर। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने राज्याभिषेक के बाद रायगढ़ के किले से अपने हिंदवी स्वराज के स्वप्न की शुरुआत की। 1676 से 1678 के बीच उन्होंने सामरिक गहराई नीति के तहत तुंगभद्रा से कावेरी तक कई किले जीता। उनकी इस युद्ध नीति के आधार पर आगे चलकर संभाजी महाराज, राजाराम महाराज और रानी तारा देवी ने मुगलों की कमर तोड़कर रख दी। मराठा योद्धाओं की दोहरी भूमिका इतिहास के पन्नों में देखने को मिलती है। मराठा योद्धा चार माह किसान की भूमिका में होते और खेती किसानी का कार्य करते। वहीं आठ माह पर्याप्त मात्रा में रसद किसे में भंडारित कर युद्ध के लिए सज्ज रहते। महाराष्ट्र मंडल के छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह में ‘हिंदवी स्वराज्य से साम्राज्य तक’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के पहले दिन श्री शिवाजी रायगढ़ स्मारक मंडल पुणे के कार्यवाह सुधीर थोराट ने इस आशय की जानकारी दी।

सुधीर थोराट ने आगे कहा कि मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति और शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी महाराज ने करीब 8 साल शासन किया। अपने पिता की तरह ही, संभाजी महाराज एक अजेय योद्धा थे। उन्होंने अपने पराक्रम से मुगलों, जंजीरा के सिद्धियों, पुर्तगालियों और अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी1681 में औरंगजेब के दक्षिण भारत में आने के बाद, संभाजी महाराज ने लगातार 8 वर्षों तक गोरिल्ला युद्ध नीति (छापामार युद्ध) अपनाकर मुगल सम्राट के दक्षिण विजय के सपनों को धूल में मिला दिया। संगमेश्वर में धोखे से उन्हें मुगल सैनिकों ने पकड़ लिया। औरंगजेब ने उन पर धर्म परिवर्तन करने और मराठा किलों को सौंपने का दबाव डाला, लेकिन संभाजी महाराज ने अपना धर्म नहीं छोड़ा।

सुधीर थोराट आगे बताते है कि जिसके बाद 1689 से 1700 तक शिवाजी महाराज के छोटे बेटे राजाराम जी महाराज ने हिंदवी स्वराज की कमान संभाली। मुगलों द्वारा रायगढ़ को घेर लिए जाने के बाद, राजाराम महाराज तमिलनाडु के जिंजी किले में चले गए। वहाँ से उन्होंने लगभग 8 वर्षों तक संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव जैसे वीर सेनापतियों के माध्यम से मुगलों के खिलाफ सफल युद्ध का संचालन किया। जिंजी के पतन से पहले ही 1698 में वे सुरक्षित महाराष्ट्र लौट आए और सातारा को मराठा साम्राज्य की नई राजधानी बनाया।

सुधीर थोराट ने आगे बताया कि महज 30 वर्ष की आयु में राजाराम महाराज के निधन हो गया। इसकी सूचना पर मुगलों ने यह मान लिया कि अब हिंदवी स्वराज टूट जाएगा। लेकिन राजाराम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी महारानी ताराबाई ने मुगलों के खिलाफ मराठा प्रतिरोध का नेतृत्व संभाला। उन्होंने 1700 से 1707 तक मुगलों को कई युद्धों में परास्त किया।