महाराष्ट्र मंडल ने मनाई विवेकानंद व जिजाऊ माता जयंती... गीता दलाल बोली- विवेक जागृत कर नरेंद्र बने विवेकानंद
2024-01-12 09:32 PM
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रायपुर। महाराष्ट्र मंडल में स्वामी विवेकानंद जयंती और छत्रपति शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई जयंती सादगीपूर्ण मनाई गई। सुबह संत ज्ञानेश्वर स्कूल (एसडीवी) में बच्चों ने स्वामी विवेकानंद और राजमाता जीजाबाई की वेशभूषा में प्रभावित किया। शिक्षकों ने दोनों विभूतियों के संदर्भ में बच्चों को ज्ञानवर्धक जानकारी दी। वहीं शाम को चौबे कॉलोनी स्थित मंडल भवन में स्वामी विवेकानंद और जीजाबाई की तस्वीरों पर माल्यार्पण कर उनके जीवन संघर्ष पर चर्चा की गई।
एसडीवी के अनेक बच्चे स्वामी विवेकानंद और राजमाता जीजाबाई के गेटअप में पहुंचे थे। शिक्षक हनुमान कन्नौजे और आराधना लाल के निर्देशन में बच्चों ने स्वामी विवेकानंद की जीवनी पर प्रकाश डाला। शिक्षकों ने बच्चों को युवा दिवस पर स्वामी विवेकानंद की जीवनी से जुड़ी कई महत्वपूर्ण और रोचक बातें भी बताईं। राजमाता जीजाबाई की जयंती भी शाला प्रांगण में मनाई गई। शाला की बच्ची राजमाता जीजाबाई की वेशभूषा में तैयार हुई। राजमाता जीजाबाई का जीवन परिचय, उनके साहस एवं देशभक्ति के बारे में अस्मिता कुसरे ने अवगत कराया। प्राचार्य मनीष गोवर्धन ने बच्चों को स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी कई रोचक बातों के साथ उनके राजधानी रायपुर आने व अनेक वर्षों तक यहां रहने के बारे में जानकारी दी।
महाराष्ट्र मंडल में शाम को परितोष डोनगांवकर ने स्वामी विवेकानंद की तस्वीर पर माल्यार्पण किया। सह सचिव गीता दलाल ने राजमाता जीजाबाई की तस्वीर पर गुलाल का टीका लगाकर सूतमाला अर्पित की। इस मौके पर गीता दलाल ने कहा कि महज 25 साल की उम्र में स्वामी विवेकानंद ने वेद, पुराण, बाइबल, धम्मपद, तनख, गुरु ग्रंथ, साहिब दास, कैपिटल, पूंजीवाद, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, साहित्य समेत अनेक पुस्तकों को पाठ कर लिया था। बचपन से ही तीव्र बुद्धि के स्वामी विवेकानंद यानी नरेंद्र परमात्मा को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखते थे। इस संदर्भ में उन्होंने ब्राह्मण समाज में भी इस विषय पर काफी चर्चा की लेकिन वह संतुष्ट नहीं हुए। गीता के अनुसार सिर्फ 39 साल की उम्र वाले स्वामी विवेकानंद ने वैचारिक ऊंचाइयों को जो आकाश छुआ, वह आज भी हमें प्रेरित करता है।
मंडल के वरिष्ठ सदस्य सेवा समिति के दीपक पात्रीकर ने अपने संबोधन में कहा कि परमात्मा को प्राप्त करने की इच्छा लेकर ब्राह्मण समाज, साधु- संतों के पास भटकने के बाद नरेंद्र रामकृष्ण परमहंस की शरण में पहुंचे। उनके नरेंद्र के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए और यही से उनके जीवन में बदलाव आया। दरअसल रामकृष्ण परमहंस भी नरेंद्र को देखकर समझ गए थे कि आज तक उन्हें एक ऐसे ही शिष्य का इंतजार था।
पात्रीकर ने बताया कि विवेकानंद बहुत तार्किक, नास्तिक और मूर्तिभंजक थे। रामकृष्ण परमहंस ने उनसे कहा था कि आखिर कब तक बुद्धिमान बने रहोगे। बुद्धि गिरा दो और समर्पण भाव में आ जाओ। तभी सत्य से साक्षात्कार हो पाएगा, अन्यथा नहीं। तत्पश्चात नरेंद्र ने अपने विवेक को जागृत किया। तभी से वे स्वामी विवेकानंद बने।
इस अवसर पर मंडल के उपाध्यक्ष श्याम सुंदर खंगन, सचिव चेतन दंडवते, पर्यावरण समिति प्रमुख अभय भागवतकर, महाराष्ट्र नाट्य मंडल के निर्देशक अनिल कालेले, वरिष्ठ आजीवन सभासद प्रशांत देशपांडे, अतुल गद्रे, सचेतक रविंद्र ठेंगड़ी सहित अनेक सदस्य व पदाधिकारी उपस्थित रहे।