कारसेवाः दहशत में कटे वो 36 घंटे... रात के अंधेरे में पार किया सरयू
2024-01-16 06:53 PM
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आचार्य चेतन दंडवते, सचिव महाराष्ट्र मंडळ रायपुर
अयोध्या के एक मठ में बिताए वो 36 घंटे आज भी याद करता हूं तो दहशत से रूह कांप जाती है। महज 19 साल की उम्र में मैं कारसेवा करने अयोध्या गया था। मुलायम सरकार के गोली मारने के आदेश के बाद हमने करीब 36 घंटे मठ के कमरे में बिताए। आज अयोध्या में राम लला विराजमान हो रहे है। ऐसे में दहशत में बिताए उन 36 घंटों का मंजर याद एक ओर जहां मन भय से भर जाता हूं, वहीं अंतमन श्रीराम की प्राण प्रतिष्ठा से प्रफुल्लित हो जाता है।
‘जिस हिंदू का खून का न खौले.. खून नहीं वह पानी है।
राम जन्मभूमि के काम न आए, बेकार वह जवानी है।।‘
90 के दशक में यह पंक्तियां सभी युवाओं की जुबान पर थी। इन्हीं पंक्तियों से प्रेरित होकर न जाने कितने लोग कारसेवा करने गए। मुझे कारसेवा करने का मौका दो बार मिला। श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट ने पहली बार कार सेवा की तिथि देवउठनी एकादशी के लिए 31 अक्टूबर 1990 को तय की। कार सेवा को लेकर रायपुर से अपने दोस्त मुकेश विश्वकर्मा, मनोज चंद्राकर, नरेंद्र यादव और अरूण शर्मा सहित आठ युवाओं के साथ मैं भी अयोध्या गया। उस समय में भाजपा युवा मोर्चा पुरानी बस्ती मंडल का अध्यक्ष हुआ करता था।
26 अक्टूबर को हम लोग सारनाथ एक्सप्रेस से अयोध्या के लिए रवाना हुए। ट्रेन कार सेवकों से भरी थी। ट्रेन में अलग-अलग स्थानों से कार सेवक अयोध्या जा रहे थे। दूसरे दिन 27 अक्टूबर को 11.45 को हम इलाहाबाद पहुंचे। इलाहाबाद से अयोध्या की ट्रेन बंद थी। अब हम सभी 8 दोस्त पैदल ही अयोध्या के लिए निकले। करीब 30 किमी पैदल चलने के बाद हमें एक ओपन टैम्पो मिली। जिससे हमने लिफ्ट ली, टैम्पो चालक ने हमें अयोध्या से 12 किमी पहले ही उतार दिया। यहां से फिर हमने 12 किमी पैदल यात्रा की और अयोध्या पहुंचे। इस दौरान हमने 27 और 28 की रात रास्ते में गुजारी। 29 अक्टूबर को हम अयोध्या पहुंच गए।
30 अक्टूबर को हम अयोध्या के एक धर्मशाला में रूके थे। पूरी धर्मशाला कारसेवकों की भरी थी। 31 को सुबह हमने सरयू में स्नान किया और कार सेवा की। इस दौरान पूरे अयोध्या में कर्फ्यू लगा था। कारसेवा के दूसरे दिन 1नवंबर को तत्कालीन मुलालय सिंह सरकार ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। 1 और 2 नवंबर को कई कार सेवकों को गोली मारी गई, कई कारसेवकों को रात के अंधेरे में सरयू में डूबाकर मार दिया गया। इस दौरान करीब 36 घंटे हम लोगों ने मठ के एक कमरे में बिताए। सूचना मिलने का कोई साधन उस जमाने में नहीं हुआ था। स्थानीय लोग बाहर आते और हमें सूचना देते थे, कि बाहर मत निकलना। कार सेवकों को देखते ही गोली मारी जा रही है।
इस बीच एक और मंजर याद आता.. मठ में हमारे बगल वाले कमरे में किसी दूसरे स्थान से आए कुछ कार सेवक रूके थे। उनमें से कुछ लोग 1 नवंबर को कमरे से बाहर निकल गए। थोड़ी देर बाद उन लोगों के मारे जाने की सूचना आई तो उनके जो साथ कमरे थे, वे भी बाहर निकल गए। देखते ही देखते पूरे कमरे में सन्नाटा पसर गया।
खैर, मठ में काम करने वालों ने 2 नवंबर को रात के अंधेरे में हम लोगों को सरयू नदी पार कराई। सरयू को पार करने के बाद हम खेतों के रास्ते फैजाबाद पहुंचे। वहीं से लिफ्ट लेकर इलाहाबाद आए। फिर वहां से ट्रेन बैठकर 4 नवंबर को रायपुर पहुंच गए।