दिव्य महाराष्ट्र मंडल

अलग कार्यशैली के बावजूद तिलक- आजाद में थी कमाल की साम्यता

0- महाराष्ट्र मंडल में गरिमामय आयोजन में मनाई गई स्वातंत्र्य वीरों की जयंती
रायपुर। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और पं. चंद्रशेखर तिवारी ‘आजाद’ की आयु में 50 वर्ष का अंतर था, लेकिन दोनों की विचारधारा में काफी समानताएं थीं। आजादी की लड़ाई के स्वातंत्र्य वीर दोनों ही महापुरूष गरम दल के माने जाते थे। एक ओर तिलक के अस्त्र उनकी कलम और वाणी थी तो दूसरी ओर आजाद के शस्त्र बंदूक और बम। दोनों ही स्वतंत्रता प्राप्ति के उदारवादी आंदोलन के प्रखर विरोधी थे, लेकिन दोनों के विरोध- प्रदर्शन के तरीके भिन्न थे। 
महाराष्ट्र मंडल में बाल गंगाधर तिलक और चंद्रशेखर आजाद जयंती पर इस आशय के विचार दिव्यांग बालिका विकास गृह के प्रभारी व महाराष्ट्र नाट्य मंडल के सचिव प्रसन्न निमोणकर ने व्यक्त किए। 
 
पावर प्रेजेंटेशन के माध्यम से दोनों ही महान व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए निमोणकर ने कहा कि बाल गंगाधर तिलक का ध्येय वाक्य ‘स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है, और वह मैं लेकर रहूंगा’ था। वहीं चंद्रशेखर आजाद का ध्येय वाक्य ‘दुश्मनों की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहें हैं, आजाद ही रहेंगे’ था। बाल गंगाधर तिलक गणित के कुशल शिक्षक थे। वहीं चंद्रशेखर आजाद ने ओरछा में हनुमान मंदिर के पास व्यायाम और युद्ध कौशल शाला की स्थापना की थी। वे तीक्ष्ण और दक्ष निशानेबाज थे। वे क्रांतिकारी युवाओं को बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दिया करते थे। 
 
निमोणकर ने बताया कि तिलक ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ निर्भिक पत्रकार थे और 1981 में केसरी मराठी में और द मराठा अंग्रेजी में समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। दो वर्षों में ही केसरी देशभर में कई भाषाओं में प्रकाशित होने लगा। वहीं चंद्रशेखर आजाद ने जालियांवाला नरसंहार से उद्वेलित होकर आजादी की लड़ाई में 14 वर्ष की आयु में ही सक्रिय हो गए। 1922 में चौरी-चौरा में पुलिस अधिकारियों की आंदोलनकारियों द्वारा हत्या करने की वजह से महात्मा गांधी को अपना असहयोग आंदोलन स्थगित करना पड़ा था। आजाद ने कहा था कि अंग्रेज शासन जालियांवाला बाग में निहत्थे लोगों का नरसंहार करता है, तो उसके प्रत्युत्तर में हिंसा को गलत नहीं ठहराया जा सकता। 
 
प्रसन्न निमोणकर ने कहा कि बिना शस्त्र के उग्र क्रांति की अलख जगाने के कारण बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल नरम दल के नेताओं से अलग हो गए। जिन्हें लाल-बाल-पाल के त्रिगुट के नाम से जाना गया। वहीं चंद्रशेखर आजाद ने शहीद भगत सिंह, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, अशफाक उल्ला खां, राजगुरु, पं. राम प्रसाद बिस्मिल, विश्वनाथ गंगाधर वैश्मपायन के साथ मिलकर सशस्त्र क्रांति की शुरुआत की थी। 
 
निमोणकर ने ऐसे ही कई पहलुओं को लेकर तिलक और आजाद की रोचक अंदाज में साम्यता पर चर्चा की। इस मौके पर विजय निमोणकर ने स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित अपने जीवन के अनुभवों को साझा किया। इस अवसर पर अध्यक्ष अजय मधुकर काले, श्याम सुंदर खंगन, परितोष डोनगांवकर, मालती मिश्रा, महाराष्ट्र नाट्य मंडल के निर्देशक अनिल श्रीराम कालेले, दीपक पात्रीकर, शचिंन्द्र देशमुख, विवेक गनोदवाले, रविंद्र ठेंगड़ी, अभय भागवतकर, कुणाल मिश्रा सहित अनेक गणमान्य प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। आभार प्रदर्शन शुचिता देशमुख ने किया।