‘अगोरा’ में दिखा नर सेवा ही नारायण सेवा.... ‘धर्म’ में नजर आया प्रेम और सौहार्द्र
- अगोरा के पात्रों ने ग्रामीण परिवेश को किया जीवंत
- महाराष्ट्र मंडल में गणेशोत्सव में हुआ दो नाटकों मंचन
रायपुर। नर सेवा ही नारायण सेवा है। जीव की सेवा करना ही परमात्मा की सच्ची सेवा है। यह दृश्य महाराष्ट्र मंडल के शहीद मेजर यशवंत गोरे स्मृति गणेशोत्सव के दौरान मंचित छत्तीसगढ़ी नाटक ‘अगोरा’ में नजर आया। वहीं नाटक ‘धर्म’ में मनुष्ट के सामाजिक, नैतिक और पारिवारिक धर्म को दिखाया गया। अगोरा नाटक में मेहत्तर का रोल करने वाल संत फरिकार ने नाटक के लिए तीन गीतों की रचना की। संत फऱिकार द्वारा रचित ‘राम नाम के टिकट कटा ले...’ ‘जग एक ठन हटरी ताय...’ और ‘तै कहा चल दे रे मुन्ना..’ गीत को सभी ने खूब सराहा। दोनों ही नाटकों का निर्देशन मंडल के आजीवन सभासद आचार्य रंजन मोड़क ने किया जिसे रंगभूमि की टीम ने मंचित किया।

‘अगोरा’ में नजर आया नर सेवा ही नारायण सेवा
नाटक अगोरा का मुख्य पात्र एक मोची है, रात को जिसके सपने में भगवान आते और कहते है कि मैं सुबह घर आउंगा। मोची सुबह से तैयारी में जुट जाता है। सुबह एक मेहत्तर उसके पास आता है, मोची उसे अपने सपने के बारे में बताता है तो मेहत्तर उसका मजाक उड़ाता है। थोड़ी देर में एक महिला मंच पर आती है, उसके पास एक बच्चा रहता है, बच्चा बहुत रो रहा था, मोची पास आकर उससे पहुंचा है कि क्या हुआ बच्चा क्यों रो रहा है। फिर वह उस महिला को बच्चे के लिए दूध देता है। उसकी यहां आने का कारण पूछता है। वह बताती है कि उसका पति भिलाई की किसी कंपनी में काम करता था, कंपनी जाने पर वहां से लोगों ने कहा कि वह हादसे का शिकार हो गया। फिर मोची उसे कंबल और कुछ पैसे देकर गांव वापस जाने की सलाह देते हुए कहता कि आज भी गांव में भगवान बसते है। महिला उसका आशीर्वाद लेकर चली जाती है। थोड़ी देर बाद एक बुजुर्ग महिला फल बेचने के लिए बाजार में आती है, और मोची के पास बैठ जाती है। तभी एक छोटी बच्ची वहां आती है केला चुराने लगती है। बुजुर्ग महिला उसे डांटने लगती है। तब मोची कहता है क्यों मार रही वह बुजुर्ग महिला को केले के पैसे देता है। फिर मोची के घर वसूलीदार आता है। मोची उसे समझता है कि यह काम छोड़ दो। ऐसे तैसे शाम हो जाती है। फिर मोची कहता है कि भगवान सुबह से शाम हो गई आप नहीं आए। तभी आवाज आती है कि मैं सुबह से शाम तक तुम्हारे पास था, तुम मुझे पहचान नहीं पाए। तुमने आज सिद्ध कर दिया कि नर सेवा ही नारायण सेवा है।


धर्म का पालन करने से बढ़ेगा प्रेम और सौहार्द्र
नाटक ‘धर्म’ के मुख्य पात्र डाक्टर देशपांडे एक चैरिटेबल क्लीनिक चलाते है। जब वे छोटे थे तो उनकी बहन को किसी से प्यार हो जाता है। वो सुसाइड कर लेती है। बड़े होने के बाद भी डाक्टर के मन यह विचार आता है कि आज समाज में महिला-पुरुष के संबंध खराब होने पर लोग आत्महत्या कर लेते है। एक दिन उनकी क्लीनिक में वही व्यक्ति आता है जिससे उसकी बहन को प्यार हुआ था। डाक्टर उसे पहचान लेते है। वह व्यक्ति मरने की स्थिति में होता है, डाक्टर उसे बचा लेते और उसे अपने पास नौकरी में रख लेते है। उसे मारने का मन बनाते है। डाक्टर उसे पुरानी घटना का याद दिलाते है, इस पर वह व्यक्ति पूछता है कि पहले मुझे क्यों नहीं मारा। इस पर डाक्टर कहते है कि मैंने पहले डाक्टर का धर्म निभाया, फिर नौकरी देकर समाज का और अब तुम्हें मारकर भाई होने का धर्म निभाउंगा और इतना कहकर उसे मार देते है। पुलिस आती है, जो डाक्टर की दोस्त थी, डाक्टर कहते है कि यह मुझे लूटने आया था, खुद को बचाने के लिए इसे मार दिया। बाद में डाक्टर दोस्ती का धर्म निभाते है और पुलिस को सब सच बता देते है। इसके बावजूद वे सजा से बच जाते है। इस नाटक के माध्यम से दिखाया गया कि स्वार्थ के चलते धर्म का पालन नहीं हो रहा है। धर्म का पालन करने से प्रेम और सौहार्द्र बढ़ेगा।
