मराठी भाषा की मिठास का मजा लीजिए, गलती मत निकालिए : फडके
0 - मराठी साहित्य सम्मेलन में जुटे देशभर के साहित्यकार, रिश्ते- नातों पर सुनाई कविताएं
रायपुर। जब भी कोई मराठी बोलता है, तो उसकी भाषा का मजा लेना चाहिए और गलती निकालने ये बचना चाहिए। यह विचार गजानन फडके ने महाराष्ट्र मंडल में चल रहे बृहन्महाराष्ट्र मंडल के राष्ट्रीय अधिवेशन में मराठी साहित्य सम्मेलन के दौरान कही। देशभर से पहुंचे कवियों ने एक से एक कविताएं सुनाकर वर्तमान परिस्थितियों के साथ रिश्ते- नातों की सच्चाई को ईमानदारी से सामने लाया।

बिलासपुर से पहुंचे गजानन फडके ने कहा कि भारत देश में हर 12 कोस में बोली- भाषा बदल जाती है। महाराष्ट्र में भी ऐसी ही स्थिति है, कोल्हापुर की मराठी अलग है, तो जुन्नर घोडेगांव में मराठी बदल जाती है। नासिक की मराठी अलग है, तो उत्तर महाराष्ट्र की मराठी बिल्कुल भिन्न। खानदेशी मराठी अलग है, तो मराठवाडा की अलग। कोंकण की मालवणी मराठी की मिठास भिन्न है, तो हमारे विदर्भ की मराठी निराले अंदाज में बोली जाती है। ऐसे में किसी को मराठी बोलते हुए देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि वह गलत बोल रहा है, सर्वथा अनुचित है। बल्कि हमें मराठी भाषा सतत बोलनी चाहिए, उसका संरक्षण करना चाहिए।
फडके ने कहा कि आठ सौ साल के बाद मराठी भाषा को केंद्र सरकार ने अभिजात भाषा का दर्जा दिया है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है। महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, संत तुकोबाराय, संत नामदेव महाराज, संत एकनाथ, संत रामदास स्वामी जैसे अनेकानेक संतों- महात्माओं ने मराठी भाषा को सींचा है। कभी विचार कीजिए कि जब संत ज्ञानेश्वर मुक्ताबाई से या संत नामदेव महाराज एक- दूसरे से मराठी में बातें करते होंगे तब उन्हें आपस में बातचीत करते हुए सुनना ही किसी त्योहार से कम नहीं होतो होगा।
साहित्य सम्मेलन के समन्वयक रामदास यशवंत जोगलेकर ने अपने संक्षिप्त संबोधन में मराठी भाषा को अधिकाधिक बोलने और उसकी मिठास बनाए रखने की बात रखी। इस मौके पर माधुरी नंदन कुलकर्णी बुरहानपुर, चित्रा क्षीरसागर गोवा, चंद्रशेखर गावस गोवा, सुबोध मांडवीकर, रविकांत खांडेकर, शुभदा चारी, गजानन फडके बिलासपुर, कमबेलकर भोपाल, सुमीता रायजादा, सुप्रिया शेष, रंजन मोडक, रामदास जोगलेकर रायपुर ने कविता पाठ किया। पौर्णिमा कलकर ने सुमधुर गजल पेश किया। शशि वरवंडकर पिता की याद में कविता पढते हुए अपने आंसू नहीं रोक पाए।