दिव्य महाराष्ट्र मंडल

कन्यादान क्यों नहीं कर सकती विधवा, बिटिया क्यों नहीं दे सकती मुखाग्निः चेतन

रायपुर। परिवार परिपाटी और संस्कार विषय पर बोलते हुए महाराष्ट्र मंडल के सचिव चेतन गोविंद दंडवते ने कहा कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच सदियों पुरानी परिपाटी को लेकर चलना अव्यवहारिक और काफी हद तक कष्टप्रद है। यहीं वजह है कि अब न तो किसी विधवा का अपनी बेटी का कन्यदान करना गलत माना जाता है। और न ही बिटिया का मुखाग्नि देना। 
 
महाराष्ट्र मंडल में आयोजित बृहन्महाराष्ट्र मंडल के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान चेतन ने कहा कि 50 साल पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे, एक ही माता पिता के तीन-चार संतानें हुआ करती थी। ऐसे में एक बेटे बेटी अथवा पिता के नहीं रहने से सदियों पुरानी परिपाटी पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता था। अब एकल संतान के चलन में यह संभव नहीं है। समाज को भी बदलती परिस्थितियों के बीच अपनी परिपाटी और संस्कृति को अपग्रेड करने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि बड़े पैकेज वाले लड़के से शादी करने की जिद और बड़े वेतन सुविधाओं वाले नौकरी की तलाश ने युवाओं की शादी की उम्र लगातार आगे बढ़ते जा रही है। अब न तो 30 साल के पहले लड़कियां शादी को तैयार हैं और न ही लड़के 32-34 साल से पहले। विलंब से शादी के बावजूद नवविवाहित जोड़ा परिवार बढ़ाकर जिम्मेदारी लेने को तैयार भी नहीं होता। और होता भी है तो महज एक संतान के लिए। ऐसे में भविष्य में हिंदू परिवारों के बच्चे चाचा-चाची, बुआ-फूफा, दीदी-जीजा जैसे रिश्ते ही भूल जाएंगे। इससे समाज का संतुलन  भी बिगड़ेगा। 
 
आचार्य चेतन ने कहा कि हर माता-पिता को अपने बच्चों को अतिमहत्वाकांक्षी बनने से रोकना होगा और खुद को भी संतोष कर उनकी यशाउम्र में शादी करने का मन बनाना होगा।