दिव्य महाराष्ट्र मंडल

हमारे संस्कारों की वजह से ही बच्चे हमसे दूरः माधुरी नंदन कुलकर्णी

रायपुर। आधुनिक काल में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और हाथ से निकलते बच्चे विषय पर बुरहानपुर से यहां आई माधुरी नंदन कुलकर्णी ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने कहा कि बचपन से ही हम बच्चों को बड़ी नौकरी करने ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए प्रेरित करते है। इसमें न केवल हम उन्हें संस्कारिक कर पाते है और न ही परिवार की आत्मीयता का बोध करा पाते है।

महाराष्ट्र मंडल में आयोजित बृहन्महाराष्ट्र मंडल के राष्ट्रीय अधिवेशन में महिला सत्र के दौरान परिसंवाद पर बोलते हुए माधुरी कुलकर्णी ने कहा कि जब मासूम सा बच्चा हमारे पास आना चाहता है तो हम ही कभी उसे ट्यूशन के नाम पर, कभी होमवर्क के नाम पर अपने से दूर करते हैं। पढ़ लिखकर वहीं बच्चा जब हमारे पास आता है तो भी हमारा आग्रह थोड़ी देर और पढ़ाई करने को लेकर रहता है। माधुरी ने कहा कि कितना आसान है यह कहना कि बच्चे विदेश में पढ़ाई करने गए। वहीं नौकरी में लग गए और बस गए। हमसे दूर हो गए। जबकि सच्चाई यह है कि बचपन में जब उन्हें हमारे गोद की, लाड प्यार की जरूरत थी तो हमने ही उन्हें अपने से दूर किया और भविष्य के लिए यही भाव सिखाए भी। कम से कम अब हमें अपनी गलती का एहसास होना चाहिए और उसे सुधारना चाहिए।

विलुप्त होते संस्कार व कुटुंब पर चर्चा करते हुए अनुश्री अरोणकर ने कहा कि बड़े-बड़े पैकेज में 12-14 घंटे नौकरी करने वाले एकल परिवार वाले अभिभावक जब आपस में ही संवाद नहीं कर पाते तो बच्चों को वो संस्कार के नाम पर क्या सीखा पाएंगे। व्यावसायिक व्यवस्ता के चलते दो चार बड़े त्योहारों को छोड़ भी दो तो लगभग सभी त्योहार विलुप्त होने की कगार पर है। कुटुंब का अर्थ बताते हुए अनुश्री ने कहा कि कुटुंब परिवार व एकता का संयुक्त शब्द है। जब परिवार ही बिखर रहे हैं तो एकता की क्या बात करें।

शोभा परांजपे ने पति के रिटायरमेंट पर व्यंग्यात्मक लेख का पठन कर लोगों को खूब हंसाया। उन्होंने कहा कि शादी के समय मुझे नहीं मालूम था कि इन (पति) से मेरी यह दूसरी शादी है। इनकी पहली शादी तो नौकरी से हो चुकी है। जिसे ये रोज 10-12 घंटे का समय देते है। और मुझे यानी दूसरी पत्नी को बमुश्किल तीन  घंटे का समय। जब ये रिटायर हुए तो मैं बहुत खुश थी कि कम से कम पहली पत्नी से इनका तलाक हो रहा है,और मुझे भरपूर समय मिलेगा। नई नवेली दुल्हन की भावनाओं के साथ रिटायरमेंट के बाद इनके साथ समय बीताने की कोशिश करती मैं और ये अपने ससुराल वालों (रिटायर्ड बैंक कर्मियों) के बीच ही ज्यादा वक्त गुजारने लगी। घर पर रहते हुए फोन काल के जरिए आपकी पेंशन कितनी बनी, कब शुरू हुई, कोई समस्या तो नहीं है, मैं क्या कर सकता हूं जैसी बातों के पीछे ही समय निकल जाता है। यही कारण है कि मैं बृहन्महाराष्ट्र मंडल के अधिवेशन में आती हूं और ये मेरे पीछे-पीछे।

 इनके अलावा पूर्णिमा केलकर ने पर्यावरण में महिलाओं की भूमिका, स्मिता नागरिकर ने पढ़े लिखे युवा विदेशों की ओर की क्यों भागते है, विषय पर, स्वाती पाठक ने वर्तमान युग में वृद्धाश्रम की आवश्यकता पर, कुमुद लाड ने पर्यावरण, संस्कृति और महाराष्ट्र मंडल की आध्यामिक समिति की समन्वयक आस्था काले ने महिलाओं के लिए योग व स्वास्थ्य विषय पर चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन गोवा की चित्रा क्षीरसागर ने किया। विशेष अतिथि के रुप में आहार विशेषज्ञ डा अभया जोगळेकर ने कहा कि सांस्कारिक जीवन में खुशियों के साथ चुनौतियां भी आएंगी, संघर्ष भी करना पड़ेगा। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम अपने खान-पान के प्रति लापरवाह हो जाए। आपकी खऱाब सेहत आपके पूरे परिवार को प्रभावित करती है।