प्रभु श्रीराम का जीवन आदर्श जीवन संहिताः डॉ. मंजूषा वैशंपायन
- महाराष्ट्र मंडल में रामायण के पात्रों पर चर्चा
रायपुर। रामायण हमें जीवन जीने की कला सिखाती है, प्रभु श्रीराम के जीवन को आदर्श जीवन संहिता कहा जाता है। आज के युग में जहां भाई-भाई से धन संपत्ति के लिए लड़ रहे हैं, एक दूसरे की हत्या के लिए भी तैयार हैं। वहीं श्रीराम और भरत का त्याग यह सिखाता है कि एक-दूसरे के सुख में सुखी कैसे रहना चाहिए। श्रीराम का जन्म केवल रावण को करने के लिए नहीं बल्कि पृथ्वी पर पुनः धर्म की स्थापना करने के लिए हुआ था। उक्ताशय के विचार डॉ. मंजूषा वैशंपायन ने महाराष्ट्र मंडल में आयोजित नवरात्र के आयोजित रामायण के पात्रों की चर्चा के दौरान व्यक्त किए।
महाराष्ट्र मंडल की आध्यात्मिक समिति की समन्वयक आस्था काले ने बतायाकि मंडल में रामनवमी उत्सव पर राम कथा के विभिन्न पात्रों पर व्याख्यान आयोजित किया गया। जिसमें डॉ मंजूषा वैशंपायन ने रामायण की प्रस्तावना व उसके महात्म्य का बहुत सुंदर वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भारत ही नहीं बाहर के देशों में भी रामायण पढ़ी जाती है, हमारे देश में जितनी बोली भाषाएं हैं उतने प्रकार की रामायण उपलब्ध हैं। रामायण में त्याग, वचन निभाने, दूसरे के सुख में अपना सुख समझना, इत्यादि बातों का वर्णन मिलता है। प्रभु श्रीराम का मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में मानवीय दृष्टिकोण से उत्तम उदाहरण कोई भी नहीं हो सकता। रामायण हमें बड़ों का सम्मान करना, भाई-बहनों से प्रेम करना, अपना कर्तव्य निभाना इत्यादि अनेक बातें सिखाती है। अगर हम इस मानव देह को उत्तम गति देना चाहते हैं तो हमें रामायण का वचन या श्रवण जरूर करना चाहिए।
डॉ. मंजूषा वैशंपायन ने आगे बताया कि धार्मिक रूप से माघ और चैत्र महीने में रामायण सुनने का महत्व है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण आज भी उतनी ही श्रद्धा से पढ़ी जाती है। भगवान शंकर ने भी श्रीराम को अपना आराध्य देव माना है। वाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम को मानव के रूप में बताया है, व अनेक प्रकार के सांसारिक संकटों से जूझते हुए इस व्यक्तित्व ने परमात्मा तत्व,देवत्व को प्राप्त किया।