माता कैकई के चरित्र का दूसरा पहलू बेहद मार्मिकः डा कमल वर्मा
2025-04-01 10:44 AM
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रायपुर। आज के समय में हममें से ज्यादातर लोगों ने रामानंद सागर की रामायण के तथ्यों को सत्य माना। रामायण के पात्र और संवाद को भी इसे के माध्यम से जाना। बहुत कम ही लोगों ने महर्षि बाल्मिकी की रामायण पढ़ी। मैं डाक्टर कमल वर्मा आज महाराष्ट्र मंडल के रामायण के पात्रों पर चर्चा की श्रृंखला में आज माता कैकई के चरित्र के दूसरे पहलू पर अपने विचार व्यक्त कर रही हूं। हम सभी ने माता कैकई से क्रूर, स्वार्थी और निर्दीय चरित्र को जाना है। लेकिन उनके जीवन का एक पहलू और था।
डाक्टर कमल वर्मा ने कहा कि राजा दशरथ ने माता कैकई को दो मनचारा वर मांगने की बात कहीं थी, जिसे उन्होंने समय आने पर मांगने की सहमति दी। घटना कुछ यूं है कि जब राजा दशरथ ने अपने राजपाठ को अपने बड़े पुत्र राम को सौंपने का विचार राजसभा में ऱखा तो यह बात राम को पता चली। तब राम सीधे माता कैकई के पास पहुंचे और उन्होंने माता से कहा कि आप यह जानती है, कि मेरे जन्म का उद्देश्य क्या है। ऐसे में अगर मैं राजपाठ संभाल लुंगा तो अपने पथ से भटक जाउंगा। इसलिए आप पिताजी के दो वचनों में पहले वचन में मेरे लिए 14 वर्ष का वनवास और राज सिंहासन की जिम्मेदारी भरत के लिए मांग लो। माता कैकई यह जानकारी थी कि राम स्वयं भगवान विष्णु के 8वें अवतार है, और उनका जन्म सनत कुमारों का श्राप भोग रहे अपने दो पार्षद जय और विजय के उद्दार के लिए हुआ है, जो इस युग में रावण और कुंभकरण बनकर पैदा हुए है। राम की फरियाद सुनकर माता कैकई ने अपने दिल पर पत्थर रखकर राजा दशरथ से ये दोनों वचन पूरा करने को कहा।
डा वर्मा ने कहा कि आज हम माता कैकई को राम के वनवास के लिए दोषी मानते है, लेकिन कहीं न कहीं यह सब नियती का खेल होता है। जिसे हम समझ नहीं पाते। आज के परिवेश में घर-परिवार बड़े बुजुर्गों के कई फैसलों पर हम भी उन्हें काफी हद तक बिना सोचे समझे दोषी मान लेते है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। समय की मांग के अनुरूप घटनाएं होती है। यह सोचकर कि इसका पहला दूसरा पहलू ज्यादा अच्छा होता कि के प्रति मन में कोई द्वेष पूर्ण विचार नहीं बनाना चाहिए। रामायण में माता कैकई का पात्र हमें इस बात की सीख देता है।