वर्तमान में रामायण की प्रासंगिकता उतनी ही जितना पुरातन काल में: डा. वर्षा वरवंडकर
रायपुर। रामायण सिर्फ एक धर्मग्रंथ नहीं अपितु जीवन का एक ऐसा सिद्धांत है, जो पुरातन काल जितना प्रासंगिक था, वर्तमान में भी उतना ही प्रासंगिक है। रामायण हमें बाल, किशोर, युवा और वृद्धावस्था पर संयमित उचित व्यवहार और सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करता है। उक्ताशय के विचार कैरियर काउंसलर डा. वर्षा वरवंडकर ने महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान कहीं।
डा. वर्षा वरवंडकर ने कहा कि रामायण से हमें पहला सबक धैर्य और स्वीकार्यता का मिलता है। पिता दशरथ से वनवास की आज्ञा मिलते ही राम ने माता कौशल्या से कहा कि ‘तात मोही दीन कानन राजू’ कितने आनंद से उन्होंने बताया कि पिताजी ने मुझे जंगल का राजा बनाया है। जीवन में जो सोचा, जो चाहा वह मिल जाए यह जरूरी नहीं। राम से हमें सीख मिलती है कि जो प्राप्त वो पर्याप्त और अभाव में ही आनंदित रहिए। अगर आप अपने परिवार को यह सीखा देंगे तो जीवन में तनाव, अवसाद, परेशानी होगी ही नहीं।
डा. वर्षा वरवंडकर ने कहा कि अपने बच्चों को सुबह स्नान करके पूजा स्थल में जाना और बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना सीखाए। यह आदत उनको दुनिया से लड़ने के लिए समर्थ बनाएगा। वहीं वृद्धजनों से कहा कि आप अपने वृद्धावस्था को गरिमामय बनाए। राजा दशरथ ने दर्पण में अपने कानों के पास के बाल के रंग को देखा तो राम का राज्यभिषेक करने और वनप्रस्थ जीवन में प्रवेश करने का मन बना लिया। 60 वर्ष के बाद हम नौकरी से रिटायर तो हो जाते है, लेकिन अपने बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं देते। महिलाएं रसोई घर में बहूओं को स्वतंत्रता नहीं देती। और यहीं से परिवार मे टकराव की स्थिति बनती है। बच्चों को निर्णय लेने की आजादी दें, गलती होगी तो उसे सुधारने का मौका दें।
डा. वरवंडकर ने कहा कि देवराज इंद्र उस जमाने में एआई का उपयोग कर गौतम ऋषि का वेश में देवी अहिल्या से मिलने पहुंचे थे। वहीं मरिची ने मृग का रूप धरकर सीताजी को माया मे फंसा लिया था। राहू के रूप में सोशल मीडिया हमारे बच्चों को भ्रष्ट कर रही है। सीता ने लक्ष्मण रेखा लांघी तो क्या हुआ आप सब जानते है, इसलिए घर में ‘डिजीटल डिस्पलिन’ जरूर बनाए। राम की केंवट, सुग्रीव, हनुमान के साथ मित्रता उनका सबका साथ सबका विकास अवधारणा का परिभाषित करता है।
डा. वरवंडकर ने कहा कि रामायण में हमें परिवार में एकता भी देखने को मिलती है। राम और लक्ष्मण वन में, भरत नंदी ग्राम में और सबसे छोटे शत्रुघ्न ने अकेले ही 14 बरस तक अयोध्या का राजपाठ संभाला। क्योंकि परिवार साथ था। रामायण से हमें क्षमा की सीख भी मिलती है। राम ने माता कैकई को क्षमा किया। मैं इस मानस पीठ से आप सभी से भी अनुरोध करती हूं कि अगर परिवार में किसी के प्रति आपकी नाराजगी होगी तो उसे यहीं भूलकर घर जाए और उन्हें क्षमा कर दें या क्षमा मांग लें।