दिव्य महाराष्ट्र मंडल

ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाती है रामायण.. निषाद राज हैं प्रेरणाः रवि

रायपुर। रामायण के जिस पात्र पर आप चर्चा करें वह हमें कुछ न कुछ जरूर सीखती है। चाहें वह राजा राम हो, भाई लक्ष्मण, भरत, माता कौशल्या या फिर राम के सखा निषादराज क्यों न हो। मंडल के सदस्य रवि गहलोत ने रामायण पर चर्चा के दौरान राम के अभिन्न सखा निषाद राज पर चर्चा करते हुए कहा कि निषाद राज का जीवन हमें प्रेरणा देता है कि प्रभु की प्रति सच्ची श्रद्धा रखने पर हमें मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रभु ने ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं रखा।

रवि गहलोत ने राम के वनवास का द्रारूण चित्रण करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम, भ्राता लक्ष्मण और वैदेही के साथ जब वन को निकले तो आर्य सुमंत उन्हें अपने रथ पर लेकर अध्योध्या की सीमा तक पहुंचे। वहां उन्होंने राम को बताया कि यहां से निषाद राज के श्रंगवेरपुर की सीमा प्रारंभ होती है। राम के आगमन की सूचना पर राम के आश्रम के सखा निषाद राज श्रीराम के स्वागत के लिए पहुंचे। राम ने उन्हें वनगमन का सारा वृत्तांत सुनाया। इस पर निषाद राज ने उन्हें 14 वर्ष तक वहीं रूकने का अनुरोध किया। इस पर राम ने कहा कि ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करने से मुनिव्रत धर्म का पालन नहीं होगा। और निषाद राज से गंगा पार करने को कहा। गंगा पार कर सब भारद्वाज ऋषि के आश्रम पहुंचे। यहां चबूतरे पर राम, लक्ष्मण और सीता बैठे, वहीं निषाद राज नीचे जमीन पर बैठने लगे। इस पर भारद्वाज ऋषि ने कहा कि निषाद राज आप भी ऊपर बैठिए। इस पर निषाद राज बोले हम छोटे लोग है, हम नीचे ही ठीक है। इस पर ऋषि बोले कि राम ने किसी को नीच नहीं रहने दिया और उन्होंने तुम्हें अपना मित्र और भाई माना, तुम्हें गले लगाया, तो फिर तुम नीच जाति के कैसे हो सकते है। 

कुछ समय बाद जब भरत राम की खोज में निकले तो उन्होंने भरत सहित पूरी सेना को गंगा पार कराया। और चित्रकूट जाकर भरत मिलाप कराया। राम की प्रति उनकी भक्ति एवं भाई से भाई को मिलाने का कार्य निषाद राज ने कराया। इससे हमें इस बात की सीख मिलती है कि हमें भाई से भाई और मित्र से मित्र को मिलाने का कार्य करना चाहिए, तथा कैसी भी परिस्थिति में प्रभु स्मरण नहीं छोड़ना चाहिए।