शबरी के पास द्ररिद्रता रूप धन और भक्ति रूपी संपत्ति थीः मेधा
रायपुर। रामायण और छत्तीसगढ़ का बड़ा गहरा नाता है। भगवान श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास का सबसे अधिक समय दण्यकारण्य यानी वर्तमान बस्तर में बिताया है। छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले में स्थित शिवरीनारायण में माता शबरी ने भगवान राम को झूठे बेर खिलाए थे। रामायण में वर्णित यह कथा हमें यह बताती है कि भगवान धन, दौलत, ऐश्वर्य से नहीं बल्कि आपके प्रेम और समर्पण से रिझ जाते है।
मेधा ने कहा कि एक दिन माता शबरी को पता चला कि भगवान श्रीराम अपनी भार्या माता सीता एवं भाई लक्ष्मण के साथ आश्रम आ रहे है। वो दिन उनके लिए परम सौभाग्य का दिन था। माता शबरी आनंद से झूम उठी और उनके स्वागत के लिए हाथ जोड़े खड़ी थी। प्रभु श्रीराम माता सीती एवं लक्ष्मण के चरण को स्पर्श करने के बाद उन्हें अपने हाथों से तैयार किए सुगंधित फूलों के आसन पर बिठाया। उनके चरणों की पूजा की। वन के फूलों की माला उन्हें धारण करवाई।
मेधा ने बताया कि इसके बाद माता शबरी ने राम से कहा क- हे भगवन! आपके दर्शन के लिए मैंने अभी तक अपने वृद्ध शरीर का त्याग नहीं किया है। आइए इस आसान पर बैठिये, मेरे पास दरिद्रता के सिवाय कोई भी धन नहीं है, आपकी भक्ति के सिवाय कोई भी संपत्ति नहीं है। इस गंगाजल से मुझे आपके चरण प्रक्षालन करने दीजिये। मेरे इस थके हुए नेत्रों से मैं आपके अनंत रूप को देखना चाहती हूँ। आज आपके दर्शन मात्र से ही मेरी तपस्या पूर्ण हुई, आज मेरा जन्म सफ़ल हुआ। वनों में घूम-घूम कर आप थक गये होंगे, भूख-प्यास लगी होगी, इसलिये आराम से यहाँ बैठिये। वनों में मेरे द्वारा घूम-घूम कर इकट्ठा किये हुए बेरों का स्वाद लीजिये, बहुत मीठे बेर है ये, मैंने ख़ुद चख कर देखे है, बिल्कुल भी ख़राब नहीं है।
माता शबरी के इस प्रेम को देखकर राम उनके झूठे बेरों को बड़े चाव से खाते है। रामायण की यह कथा हमें बताती है कि भगवान सिर्फ प्रेम और समर्पण से रिझते है। हमें भी अपने आराध्य के प्रति ऐसा ही भाव रखना चाहिए। यह भाव सिर्फ भगवान के प्रति ही नहीं अपितु अपने घर के बड़ें बुजुर्गों, गुरूओं के प्रति भी होना चाहिए। क्योंकि कण-कण में राम का वास है।