वसुनन्द और सुनन्द ऋषि ने तपस्या कर भगवान विष्णु से मांगा था पिता स्वरुप साथः वीभा
रायपुर। वाल्मीकि रामायण के अनुसार लव-कुश पूर्व जन्म में वसुनन्द व सुनन्द दो ऋषि भाई थे। उन्होंने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की। भगवान प्रसन्न हुए तब उन्होंने वरदान मांगा कि उनका साथ उन्हें पिता स्वरुप मिले। भगवान ने उनकी बात मानते हुए उन्हें वरदान दिया कि त्रेता युग में वे श्रीराम और माता सीता के पुत्र रूप में आएंगे। वर्तमान में कानपुर से 17 किलोमीटर स्थित बिठूर में वाल्मीकि का आश्रम है। माना जाता है कि यहां लव-कुश का जन्म यही हुआ था। रामायण की रचना भी यही की गई थी। उक्ताशय के विचार वीभा पांडे ने मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान कहीं।
दसवीं शताब्दी के कथा सरितसागर के अनुसार रामायण की पुनर्कथनानुसार माता सीता ने लव को जन्म दिया। माता सीता एक दिन ऋषि वाल्मीकि की देखभाल में लव को छोड़कर स्नान करने चली गई। तभी वाल्मीकि जी ने उसे खो दिया और घबराहट में कुशाघास का प्रयोग कर प्रतिरूप बनाया और उसमें प्राण फूंक दिए। इस तरह लव क्षत्रिय और कुश ब्राह्मण हुए।
जब श्रीराम ने माता सीता के लिए वानप्रस्थ का निर्णय लिया, तब भरत का राज्याभिषेक करना चाहा परंतु वे नहीं माने तब लव को उत्तर कोसल का राज्य व कुश को दक्षिण कोसल का राज्य दिया गया। कालिदास द्वारा रचित रघुवंश के अनुसार लव को शरावती व कुश को कुशावती का राज्य दिया गया। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में स्थित आज के बिलासपुर में कुश की राजधानी थी। उन्हें अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल पर्वत को पार करना पड़ता था इससे सिद्ध हो जाता है कि उनका राज्य दक्षिण में ही था।
लव ने लवपुरी की स्थापना की जो आज का लाहौर शहर है जो पाकिस्तान में स्थित है। बाद में इसे लोहपूरी कहा जाने लगा। एशियाई देश लाओस थाई नगरी लोबपूरी इन्हीं के नाम पर रखे गए हैं। कुश ने कसूर की स्थापना की जो आज पाकिस्तान में स्थित है। यहां किले पर आज भी इनका मंदिर है।
ऐसा कहा जाता है कि लव और कुश के वंशज आज भी मौजूद हैं | कुश वंश से कुशवाहा, सैनी, मौर्य और शाक्य संप्रदाय की स्थापना हुई। राजा लव से राघव राजपूत की स्थापना हुई जिनमें बर्गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा सिसोदिया राजपूत वंश की है जिनमें बैछला और गहलोत वंश के राजा हुए। एक शोध के अनुसार लव और कुश की 50 वीं पीढ़ी में शैल्य हुए जो महाभारत में कौरवों की तरफ से लड़े। कहा जाता है कि 2500 से 3000 वर्ष महाभारत के पूर्व लव और कुश हुए थे। बाद में लव और कुश ने राजपाट त्याग कर बैराग धारण कर लिया और मुनि बन गए। उन्होंने घोर तपस्या की और जीवन के अंत में पावागढ़ गुजरात में मोक्ष प्राप्त किया जहां आज भी उनका विशाल मंदिर है।