दिव्य महाराष्ट्र मंडल

जनक नाम नहीं उपाधि... धर्म और न्याय के थे ज्ञाताः दलाल

रायपुर। भगवान श्रीराम और माता सीता की कथा अत्यंत पवित्र, सुंदर और मन को भाने वाली है। इनकी कथा कितनी बार सुनी फिर भी एक बार फिर सुनने का मन करता ही है। हिंदू महाकाव्य रामायण के एक पात्र राजा जनक है। राजा जनक मिथिका के राजा था। जनक एक उपाधि है। निमीवंश को सभा राजाओं को जनक कहा जाता था। राजा जनक धर्म और न्याय के ज्ञाता थे। उक्ताशय के विचार गीता दलाल ने महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर आयोजित चर्चा के दौरान राजा जनक पर चर्चा करते हुए कहीं।

दलाल ने कहा कि निमीवंश के राजा हस्वरोमा के दो पुत्र हुए सीरध्वज और कुशध्वज। राजा जनक का नाम सीरध्वज था जो बडे बेटे थे। उनका विवाह सुनयना से हुआ। उनकी दो पुत्री थी, सीता और उर्मिला। वहीं उनके भाई कुशध्वज की कन्या माण्डवी और श्रुतकीर्ति हुई। राजा जनक महागुरु अष्टावक्र के शिष्य थे। जनकपुर में जब एक बार अकाल पड़ा तो राजा जनक खुद खेतों की जोताई करने पहुंचे। जोताई के दौरान हल की सीत के टकराने के बाद एक कलश धरती से निकला जिसमें एक सुंदर कन्या निकाली। जिसके बाद जनक ने उनका राम सीता रखा।

वनवास के लिए निकले राम को वापस लाने जब भरत गए तो उनके साथ राजा जनक भी गए थे। चित्रकूट में राम से मिलने के बाद भरत और राम के मध्य संवाद में जनक की भूमिका खास रही। दलाल ने बताया कि राम ने जनक से कहा कि आप धर्म के पूर्ण ज्ञाता है, इसलिए मुझे विश्वास है कि मेरे धर्म की रक्षा करेंगे। मुझे अपना सेवक समझ आप जो आज्ञा करेंगे मैं उसे पूरा करूंगा। वहीं भरत ने राजा जनक से कहा कि आप एक पिता की भांति मुझे अधर्म से बचाएंगे। मेरे ह्रदय के प्रेम को जानकार न्याय करेंगे। राम और भरत का पक्ष सुनने  का बाद राजा जनक ने कहा कि तुम दोनों में महान कौन इसका निर्णय तो स्वयं ब्रहमा जी भी नहीं कर सकते फिर मैं तो तुच्छ प्राणी हूं। फिर भी भगवान शंकर को प्रणाम कर उनकी प्रेरणा से कहता हूं। हे राम धर्म से बड़ी कोई शक्ति नहीं जिससे हम सब बंधे हुए है। लेकिन प्रेम में किसी धर्म का बंधन नहीं होता। भक्ति और प्रेम से आगे के आगे साक्षात ईश्वर भी सृष्टि के सारे नियम तोड़ देते है। इसलिए प्रेम की जीत हुई भरत। लेकिन यह ध्यान रखना प्रेम का भी एक विधान है। प्रेम की असली शक्ति उसके निस्वार्थ होने से है। और प्रेम जब निस्वार्थ होता है तो कुछ मांगता नहीं। जिससे प्रेम करता उसकी खुशी के लिए समर्पित हो जाता है। इसलिए भरत तुम राम के चरणों मे बैठों और उनसे पूछों उनकी प्रसन्नता किसमें है और तुम वहीं करो। फिर भरत राम की खड़ऊ लेकर अयोध्या लौटते और 14 वर्षों तक राजपाठ संभालते है।