बचपन में मिला श्राप युवावस्था में साबित हुआ वरदानः परितोष
रायपुर। रामायण काल में सेतु निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले नल-नील से जुड़ी कई रोचक प्रसंग है। जिनमें से गिलहरी का सेतु निर्माण में योगदान और प्रभु श्रीराम द्वारा पत्थर समुद्र में छोड़े जाने का जिक्र है। वहीं एक अन्य प्रसंग और संतों द्वारा सुनने को यदा-कदा ही सुनने को मिलता है। जिसमें वानर कुमारों नल-नील को बचपन में मिले श्राम का उल्लेख मिलता है। उनके शरारती गुण के कारण दोनों ऋषि-मुनियों से श्राप मिला था कि जो भी वस्तु वे पानी में फेंकेंगे, वह डूबेगी नहीं, और इसी श्राप का उपयोग उन्होंने समुद्र पर रामसेतु (पुल) के निर्माण के लिए किया। उक्ताशय के विचार महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान नल-नील पर बोलते हुए परितोष डोनगांवकर ने कहीं।
परितोष ने आगे कहा कि चैत्र नवरात्र की अष्टमी के पावन अवसर पर आज मुझे यहां रामायण के पात्रों नल और नील पर अपने विचार व्यक्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उसके लिए आध्यात्मिक समिति का बहुत बहुत धन्यवाद। मेरा धार्मिक क्षेत्र में ज्ञान आप सभी के सामने नगण्य है पर मुझे गर्व है कि मैं भी आपकी तरह ही सनातन धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर ने मुझे भी अवसर दिया है।
अब तक इस आयोजन में अनेक वक्ताओं ने रामायण के विभिन्न पात्रों पर अपने विचार रखे, किंतु खेद का विषय है कि शायद ही कोई इनको अक्षरशः अमल करता हो। रामायण के पात्रों की जीवन शैली से प्रेरणा लेकर हमें भी अपनी जीवन शैली में सकारात्मक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।
आज मैं नल और नील की वीरता, कुशल नेतृत्व क्षमता एवं अभियंता के रूप में वानर सेना को लंका तक ले जाकर श्रीराम की सेना को विजय दिलाने के विषय में अपने विचार रख रहा हूँ। विश्वकर्मा जी के आदेश से सेतु निर्माण प्रारंभ हुआ। शिला समुद्र में डूब जाती थी, जामवंत ने प्रभु श्रीराम से आशीर्वाद प्राप्त कर शिलाओं पर प्रभु श्रीराम का नाम लिखकर उन्हें समुद्र में छोड़ा और शिलाएँ तैरने लगीं, जिससे कुशल अभियंता नल और नील के लिये सेतु निर्माण सरल हो गया. सेतु निर्माण के साथ दो प्रसंग और जुड़े हैं उनका उल्लेख भी प्रासंगिक है।
प्रसंग-1 एक गिलहरी भी मिट्टी के छोटे-छोटे कण अपने दांतो से पकड़ कर समुद्र में छोड़ रही थी. प्रभु श्रीराम की दृष्टि जब उस पर पड़ी तो उन्होंने स्नेहवश उसे उठा लिया और उसकी पीठ पर ममत्व के भाव से उंगली फेरने लगे. प्रभु श्रीराम की उंगलिया आज भी गिलहरी की पीठ पर अंकित हैं।तभी से मराठी की कहावत - मराठी म्हण "खारी चा वाटा" प्रचलित है. जिस प्रकार "राम काज" में गिलहरी का योगदान अमरत्व पा गया उसी प्रकार प्रत्येक सत्कार्य में छोटे से छोटा योगदान भी महत्वपूर्ण होता है.
प्रसंग- 2. सेतु निर्माण में जब शिलाएँ समुद्र में तैरने लगी तो एक शीला प्रभु श्रीराम ने स्वयं समुद्र में छोड़ी. वह शीला समुद्र में डूब गई. वानर सेना में आश्चर्य का भाव पसर गया. तब श्री हनुमान जी ने कहाँ कि "भगवन आप जिसे छोड़ देंगे वो कैसे तैर सकता है?"
प्रसंग-3 नल और नील बचपन में बड़े, नटखट थे और साधुओं के आश्रम में जाकर उनकी वस्तुओं को नदी में फेंक देते थे, जिससे परेशान होकर साधुओं ने नल और नील को श्राप दिया कि आप दोनों जो भी वस्तु पानी में डालोगे तो वो डूबेगी नहीं। यही श्राप सेतु निर्माण में वरदान साबित हुआ और लंका जाने के लिए श्रीराम की सेना का सेतु बनाने में नल और नील का प्रनुख योगदान हुआ।