दिव्य महाराष्ट्र मंडल

छत्तीसगढ़ के लोगगीतों और लोककथाओं पर रचे बसे हैं रामः शुचिता देशमुख

रायपुर। राम प्रेम, विश्वास और समर्पण है। अपने वनवास काल में श्रीराम सबसे ज्यादा समय दण्यकारण्य यानी हमारे छत्तीसगढ़  बिताया। इस दौरान उनहोंने जो सबसे बड़ा काम किया वह था उनका समभाव। उन्होंने वनवासियों और लोकजन से आत्मीयता के साथ भेंट की और उनका वरण किया। वे वनवासियों के बीच पहुंचे तो उन्हें लगा राम को वनवास नहीं हमें एक नया राजा मिला है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति प्रचलित सभी लोकगीतों, तीज-त्योहार, व्यवहार में राम  को अपने जीवन में उतारा। उक्ताशय के विचार शुचिता देशमुख ने महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान प्रभु श्रीराम के चरित्र का वर्णन करते हुए कहीं।

शुचिता ने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ के व्यवहार में राम का ना पहले है। इसलिए यहां के लोग जब एक-दूसरे मिलते है तो नमस्कार के बजाए सीता-राम या राम-राम कहते है। वहीं छत्तीसगढ़ के लोगों ने छत्तीसगढ़ी लोकगीत के माध्यम से अपने हर उत्सव, उमंग, तीज-त्यौहार, सुख-दुख, शोक, अपनी भक्ति में अपने अनुरूप समाहित किए हैं। छत्तीसगढ़ में लोककथा, लोकगाथा और लोकगीत इन सब में राम और राम कथा व्याप्त है।

शुचिता ने आगे बताया कि छत्तीगढ़ी लोकगीत में भोजली, जंवारा, सुआ गीत, बसदेव गीत, माता सेवा गीत, ददरिया, पंडवानी, नांचा-कूदा, गम्मत आदि राम की कथा को लोक रंग में रंग गया है। गांव-गांव में रामायण मंडलियां है, जो मनोरंजन के लिए गांव में अपनी प्रस्तुति देती है। रामायण के हर पात्र को अलग-अलग प्रसंगों में उनकी प्रस्तुतियां लोगों के मनोरंजन का बड़ा साधन है। आज भी छत्तीसगढ़ के गांवों में यह आसानी से देखने को मिल जाता है।