दिव्य महाराष्ट्र मंडल

राम के चरणों के स्पर्श से देवी अहिल्या का हुआ उद्धारः अर्चना धर्माधिकारी

रायपुर। महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौराम अर्चना धर्माधिकारी ने गौतम ऋषि की पत्नी देवी अहिल्या पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि मैं आहिल्या... ब्रह्माजी की मानसपुत्री। सब लोग कहते हैं की मैं बहुत सुंदर, गुणसम्पन्न, तथा मनमोहक हूं और मेरी सरलता के कारण सबकी चहेती भी हूं। मैं जब विवाह योग्य हुई तब बाबा (ब्रह्माजी) ने मेरा विवाह गौतम ऋषि से कराया। गौतम ऋषि बड़े तपस्वी ऋषि थे और सप्तऋषियों से एक जाने जाते हैं।

हमारा विवाह सम्पन्न हुआ। अब मैं गौतम ऋषि की पत्नी बन गई थी। हम दोनों सुखपूर्वक एक आश्रम में रहा करते  थे की अचानक मेरी गृहस्थी को एक बुरी नजर गई। एक दिन इन्द्रदेव वन भ्रमण पर थे। उनकी नजर हमारे आश्रम पर गई। मैं आश्रम के बगिया में खड़ी थी। उन्होंने मुझे देखा और उनका मन मेरी ओर मोहित हो गया और वह देखते ही रह गए।

कुछ दिनों तक उन्होंने गौतम ऋषि की दिनचर्या पर नजर रखी। एक दिन ऋषि गौतम, भोर में ही नदी पर स्नानादि क्रियाएं करने चले गए। इस मौके का फायदा इन्द्र ने उठाया और वे गौतम ऋषि का वेश धारण कर हमारी कुटिया में आ गए और मुझसे ऋषि रूप में प्रेम भरी बातें करने लगे। वो मेरे समीप आ गए थे और में भी उनकी तरफ आकर्षित हो गयी और अपना तन मन उनको समर्पित कर दिया।

इधर कुछ समय पश्चात् प्रत्यक्ष ऋषि गौतम आये, वे देखकर अत्यंत क्रोधित हो गये, इन्द्र वहा से भाग निकला परंतु गौतम ऋषि ने उनको शाप दिया की "तुम नपुंसक बन जाओ।" [यही कारण था की इन्द्र भगवान की पूजा नहीं होती।] फिर उन्होंने मुड़कर मेरी तरफ देखा, मैं डर के मारे थर-थर कांपने लगी थी, मेरे साथ क्या हुआ मुझे समझ नहीं आ रही थी।

उन्होंने मुझे कुलटा, कुलक्षिणी कहा,मेरे ऊपर कई लांछन लगाए और मुझे श्राप दिया कि  "तुम पत्थर (शिला) बनोगी।" थोड़ी देर बाद जब उनका क्रोध शांत हुआ, मैं उनसे माफी मांगते हुए कहा कि मैं अनजान थी, मुझे एहसास नहीं था मेरे साथ जो हुआ वह धोखा था। मैं उसको समझ नहीं पाई, मेरी कोई गलती नहीं है।

थोड़ा शांत होकर उन्होंने मुझे वरदान दिया की त्रेता युग में जब श्रीराम आएंगे वही तुम्हारा उद्धार करेंगे और बाद में ऋषि गौतम हिमालय चले गए। हजारों साल बीत गये, अब मैं एक पत्थर बन गई थी। आंधी, तूफान, धूप, बारिश का सामना कर रही थी। फिर एक दिन प्रभु श्रीराम, वाल्मीकि के साथ और वशिष्ठ ऋषि के साथ पथ पर चले, वे पत्थर पर कदम रखते ही धीरे-धीरे के स्पर्श से मैं अपने मूर्त रूप में आ गई। फिर एक क्षण में मेरी आंखों से अश्रुधारा बहने लग गई।  मैं बोली हे प्रभु, आज मेरा जीवन धन्य हो गया। आज मुझे मेरा जन्म सफल हो गया, आप धन्य हो।तो ऐसी थी दिव्य स्त्री अहिल्या परम प्रतापी श्रीरामचन्द्र।

मराठी दासबोध में भी इसका वर्णन किया है।

अहिल्या शीला राघवे मुक्त केली

पदी लागता दिव्य होवून गेली

जया वर्णिता क्षिणली वेदवाणी

नुपक्षी कदा राम दसाभिमानी।