विपरीत परिस्थितियों में परिवार को साथ छोडने वाले विभीषण आज भी हमारे समाज में अस्वीकार्य: ठेंगडी
2025-04-07 02:55 PM
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रायपुर। विभीषण विपरीत परिस्थितियों में अपने परिवार का साथ छोडकर प्रभु राम के पास चले गए। रावण से हुए भीषण युद्ध में उन्होंने धर्म यानी प्रभु राम का साथ दिया। रावण, मेघनाथ को मारने की युक्ति बताई। लक्ष्मण की जान बचाने के लिए संजीवनी बुटि लाने का उपाय भी बताया। इसके बावजूद वे आज भी हमारे समाज में न केवल अस्वीकार्य है बल्कि विभीषण को गाली व अपमान का सूचक माना जाता है। महाराष्ट्र मंडल के रामनवमी महोत्सव के अंतिम दिन सचेतक रविंद्र ठेंगडी ने विभीषण के पात्र पर इस आशय के अपने विचार रखे।
ठेंगडी ने महाभारत के भीष्म और रामायण के पात्र विभीषण का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए कहा कि भीष्म जीवनभर अधर्म की राह पर चलन वाले अंधे राजा धृतराष्ट्र और कौरव पुत्रों के साथ रहे। हर क्षण उन्हें धर्म की राह पर चलने, न्यायसंगत रहने की सीख देते रहे। यही कारण है कि आज भी हमारे समाज में भीष्म को उनकी प्रतीज्ञा के लिए स्मरण किया जाता है। आपकी जिम्मेदारी है कि विपरीत परिस्थितियों में परिवार के साथ एकजुट होकर रहें। हर परिवार के विचार से, आचरण से अच्छे- बुरे अलग-अलग सदस्य हो सकते हैं। इसका यह आशय नहीं कि आप उन्हें छोडकर पराए लोगों के साथ सुर मिलाने लगें।
रविंद्र ठेंगडी के अनुसार वैसे तो विभीषण एक अच्छे पिता थे और उन्होंने अपने बच्चों को बेहतर संस्कार दिए थे। उनकी बेटी त्रिजटा आस्तिक थी। पूजा- पाठ, जप-तप में विश्वास रखती थीं। उन्हें देवों से कई सिद्धियां मिली हुई थीं। इसी वजह से रावण भी उनसे विवाद करने से हिचकिचाते थे। त्रिजटा माता सीता की अशोक वन पर पूरे आदर के साथ देखभाल करती थीं। इतने अच्छे संस्कारों वाली त्रिजटा के पिता हमारे समाज में घृणा के पात्र हैं, तो सिर्फ इसलिए कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में पूरे परिवार को छोड दिया था।