दिव्य महाराष्ट्र मंडल

शुभांगी आप्टे ने पर्यावरण संरक्षण को बनाया मिशन.... एक जुनून जो रुकता नहीं!

वेदप्रकाश त्रिपाठी। रायपुर की सड़कों पर अगर आप किसी को कपड़े की थैलियां बांटते देखें, बच्चों के बीच थैली वाली आंटीके नाम से मशहूर और पर्यावरण के लिए जुनून से भरीं एक सुपरवुमन की तरह काम करते हुए, तो समझ जाइए कि आप महाराष्ट्र मंडल की आजीवन सभासद शुभांगी आप्टे से मिल रहे हैं। 71 साल की उम्र में, जहां लोग रिटायरमेंट की प्लानिंग करते हैं, शुभांगी जी ने 145 रिकॉर्ड्स अपने नाम किए हैं। 47 हजार  से ज्यादा कपड़े की थैलियां बांटी हैं और पर्यावरण संरक्षण को एक मिशन बना लिया है। 

2005 की एक साधारण सी शाम। शुभांगी टीवी पर एक दिव्यांग बच्चे को पेंसिल का कलेक्शन करते देख रही थीं। बस, यहीं से उन्होंने कुछ अनोखा करने की ठान ली। उनके पति, एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव, जिन्हें कंपनियों से की-रिंग्स मिला करती थीं। घर में पड़े 40 की-रिंग्स से शुरू हुआ उनका सफर 2007 में 3,500 की-रिंग्स के साथ लिम्का बुक आफ रिकॉर्ड्स तक जा पहुंचा। लेकिन ये तो बस ट्रेलर था! आज उनके पास छोटे-छोटे कलेक्शन्स का खजाना है- आधा इंच का हंसिया, एक इंच की आटा चक्की, चांदी का कैलेंडर, आधे इंच की खड़ाऊ, और न जाने क्या-क्या! ये सब लिम्का, इंडिया बुक और चैंपियंस बुक में चमक रहे हैं। 600 से ज्यादा पुरस्कार, जिनमें 2012 का महा वस्त्र पैठणी सम्मान और 2014 में चीन में भारत के कंसल जनरल के हाथों मिला सम्मान शामिल हैं। लेकिन उनके लिए असली इनाम है लोगों का प्यार और पर्यावरण की मुस्कान।

प्लास्टिक की जंग : थैली वाली आंटी का मास्टरस्ट्रोक

2008 में एक खबर ने शुभांगी जी का दिल तोड़ दिया। अखबारों में लिखा था कि प्लास्टिक की थैलियां खाने से गायें मर रही हैं। बस, उस दिन उन्होंने ठान लिया- प्लास्टिक को जड़ से उखाड़ना है। घर की सिलाई मशीन निकाली, कपड़े के टुकड़े जोड़े और शुरू हो गया कपड़े की थैलियों का मिशन। स्कूलों में बच्चे, कॉलेजों में युवा, बाजारों में महिलाएं, हर कोई उनकी थैलियों का दीवाना हो गया। आज तक 47,000 से ज्यादा थैलियां बांट चुकी हैं, वो भी बिना किसी सरकारी मदद या एनजीओ के सपोर्ट के! लोग हंसते थे, कहते थे, ‘‘अकेली क्या कर लेगी?’’ लेकिन शुभांगी जी ने अपने काम से उन्हें जवाब दिया। टेलर्स, कपड़ा व्यापारी, रिश्तेदार, एक-एक कर सब उनके मिशन में शामिल हो गए। अब तो लोग खुद उनके पास बचे कपड़े छोड़ जाते हैं। अकेले ज्यादा थैले सिलना संभव नहीं था, ऐसे में मिशन और तेज करने कुछ महिलाओं को बतौर मेहताना देकर थैले सिलने का काम देने लगीं। वे कहती हैं, ‘‘मैंने अपने लिए कभी कोई शौक नहीं किया। सारी बचत इन्हीं सब कार्यों में लगाती रहीं। इससे जो सुकून मिलता है, वो अनमोल है।’’ इसी जुनून ने उन्हें नो-प्लास्टिक कैंपेन मोर रायपुर, स्वच्छता अभियान रायपुर और ग्रीन इंडिया का ब्रांड एंबेसडर बनाया।

दृष्टिबाधित बच्चों के लिए एक खास रोशनी

शुभांगी जी का दिल इतना बड़ा है कि वो सिर्फ पर्यावरण तक नहीं रुकता। उन्होंने नागपुर के दृष्टिबाधित विद्यालय के साथ मिलकर राम रक्षा स्तोत्र, हनुमान चालीसा और गणपति अथर्व शीर्ष को ब्रेल लिपि में छपवाया। इतना ही नहीं, दृष्टिबाधित बच्चों के लिए तीन गेम्स की किताबें भी बनार्इं, जो वे देशभर में मुफ्त बांटती हैं। ये है उनका प्यार, जो हर अंधेरे में रोशनी बिखेरता है।

145 दिन, 13 राज्य : एक और कमाल

शुभांगी जी को बचपन से घूमने का शौक था। 2019-2020 में उन्होंने पति के साथ 145 दिनों में 13 राज्यों की यात्रा की। हिमालय के सरपास, नैनीताल और डलहौजी में तीन बार ट्रेकिंग की। सारी टिकटें आज भी उनके पास हैं, जैसे हर यात्रा की एक कहानी हो। और हां, इस यात्रा ने भी एक रिकॉर्ड बनाया!

‘‘रिटायरमेंट? वो क्या होता है!’’

होम साइंस में बीएससी और साइकोलॉजी में एमए करने वाली शुभांगी जी चाहतीं तो नौकरी कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने बुजुर्ग सास-ससुर की सेवा को चुना। उनका बेटा-बहू दुबई में इंजीनियर हैं और बेटी मुंबई में होम्योपैथी डॉक्टर। पति के सपोर्ट से वे अपने सारे सपने पूरे कर रहीं हैं। रायपुर के महिला थाने में 14 साल से काउंसलर की भूमिका निभा रही हैं। उनका मंत्र है, ‘‘जब तक सांस, तब तक जुनून।’’