‘एक मैसेज फावर्ड और सैकड़ों लोग उतर आएंगे सड़कों पर’
2025-09-01 06:03 PM
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- वाद-विवाद स्पर्धाः सोशल मीडिया का छात्र जीवन में प्रभाव
रायपुर। सोशल मीडिया प्लेटफार्म हमारे इस युवा समाज के लिए अभिशाप भी है और वरदान भी। इन दोनों को जस्टिफाई करने लिए सबसे अधिक जिम्मेदार इसके इस्तेमाल के समय, उपयोग, दूरदर्शिता और उद्देश्य पर निर्भर करता है। एक सही मैसेज जहां पीड़ित को न्याय दिलाता और सही बात लाखों लोगों तक पहुंचाता है, वहीं दूसरे ओर एक गलत मैसेज का फावर्ड होना इतना खतरनाक हो सकता है, कि देखते ही देखते लाखों लोग सड़क पर उतर आते है। निर्भया कांड के बाद इसी सोशल मीडिया ने पीड़ितों को न्याय दिलाने में मदद की, वहीं कोविड काल में वैक्सीन के दुष्प्रभाव के कारण न जाने कितने लोगों ने वैक्सीन नहीं लगाई और लापरवाही के चलते उन्हें अपने प्राण न्यौछावर करने पड़े। ऐसी ही कुछ बातें निकलकर आई महाराष्ट्र मंडल में आयोजित शहीद मेजर यशवंत गोरे स्मृति गणेशोत्सव में आयोजनों की श्रृंखला में 1 सितंबर को हुए वाद-विवाद प्रतियोगिता में। विषय था सोशल मीडिया का छात्र जीवन में प्रभाव।

वाद-विवाद स्पर्धा में संत ज्ञानेश्वर विद्यालय के साथ बालाजी स्कूल और माता सुंदरी काली बाड़ी स्कूल के बच्चों ने उत्साह के साथ भाग लिया। स्पर्धा की शुरूआत काली बाड़ी स्कूल के गौरव शर्मा ने पक्ष पर अपना विचार रखते हुए कहा कि आज के समय में अपनी बातों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का यह सुगम माध्यम है। वहीं काली बाड़ी स्कूल के विवेक ने इसके दुष्प्रभावों को रेखांकित किया। संत ज्ञानेश्वर की कोमल जांगे ने पक्ष में अपने विचार रखते हुए कहा कि आज हम आपस में इतने दूर है, किसी के घर को कोई बच्चा बाहर पढ़ाई कर रहा है, ऐसे में सोशल मीडिया के माध्यम से हम जुड़े हुए है। वहीं एसडीवी की हिमांशी लोढ़ा ने विपक्ष में अपने विचार रखते हुए कहा कि सोशल मीडिया में एक गलत मैसेज का फावर्ड और सैंकड़ों लोग सड़क पर उतर आते है। इन आक्रोशों में मंदिर भी जलते हैं और घर भी।

एसडीवी के छात्र तन्वय भगाड़े ने पक्ष पर अपना विचार रखते हुए कहा कि आज हम यहां गणपति बप्पा का उत्सव मना रहे हैं, ऐसे में हमारे इन आयोजनों की सूचना हमारे अपने तक इसी सोशल मीडिया के माध्यम से पहुंचती है। इसलिए यह आवश्यक है, वहीं बालाजी स्कूल की चयनिका पांडे ने कहा कि निर्भया कांड को राजनिति के चलते दबाने का पूरा प्रयास किया गया। इसी सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल ने निर्भया के परिजनों को न्याय दिलाया। विपक्ष पर अपना मत रखते हुए बालाजी स्कूल की प्रिशा राठोर ने कहा कि आज 2 साल की उम्र से 18 साल तक के बच्चे मोबाइल फोन चला रहे है। जिसका हमारे फिजिकल हेल्थ में भी गहरा असर पड़ रहा है। एसडीवी स्कूल की श्रद्धा इस्सर ने अपने पूर्व की वक्ताओं की बातों का खंडन करते हुए कहा कि जिस चाकू का निर्माण सब्जी काटने के लिए हुआ उससे अगर जानवरों और लोगों को काटा जा रहा है, तो हम चाकू या उसे बनाने पर दोष नहीं दे सकते है। कहीं न कहीं उसका गलत इस्तेमाल करने वाला ही दोषी है। इसी तरह सोशल मीडिया भी इसका गलत इस्तेमाल करने वालों की संख्या अधिक है, ऐसे इसे बंद तो नहीं किया जा सकता लेकिन एक उम्र सीमा तक इस्तेमाल को लेकर सतर्क रहना बेहद जरूरी है, नहीं तो इसे दुष्परिणाण ही देखने को मिलेंगे।
युवा समिति की प्रमुख डा. शुचिता देशमुख ने बताया कि स्पर्धा में निर्णायक की भूमिका महाराष्ट्र मंडल साहित्य समिति की प्रमुख वरिष्ठ आजीवन सभासद कुमुद लाड और मंडल सचेतक रविंद्र ठेंगड़ी ने अदा की। दोनों से निर्णायकों ने कार्यक्रम के उपरांत बच्चों को उच्च स्तरीय वाद-विवाद में भाग लेने की तकनीक सांझा की। स्पर्धा में पक्ष में एसडीवी के तन्मय भगाड़े प्रथम और बालाजी स्कूल की चयनिका देवांगन द्वितीय रही। वहीं विपक्ष में बालाजी स्कूल की प्रिशा राठौर प्रथम और एसडीवी की श्रद्धा इस्सर द्वितीय स्थान पर रही। इस अवसर युवा समिति के समन्वयक विनोद राखुंडे, रीना बाबर, उदित बक्षी, मेघा पोतदार, समीर देशमुख और करिश्मा अंजनकर ने भरपूर सहयोग दिया।