महाराष्ट्र मंडल में "मराठी मोडी लिपि' की कक्षाएं 9 से 13 सितंबर तक
रायपुर। महाराष्ट्र में प्राचीन समय से इस्तेमाल की जाने वाली ‘मोडी लिपि’अब विलुप्त होने के कगार पर है। सन् 1950 से पहले महाराष्ट्र के स्कूलों में मोडी लिपि पढ़ाई जाती थी. लेकिन समय के साथ अब मोडी की जगह देवनागरी लिपी ने ले ली। महाराष्ट्र का गौरवशाली इतिहास आज भी इसी मोडी लिपि में छिपा है। राजधानी के महाराष्ट्रीयन परिवारों और मराठी जानने वालो को मोड़ी लिपि की फिर से जानने का मौका मिलने जा रहा है। जी हां... महाराष्ट्र मंडल में चले रहे श्रीमद् भागवत कथा महापुराण में पहुंचे कथावाचक आदरणीय धनंजय शास्त्रीजी वैद्य, अध्यक्ष धर्म सभा विध्वस्तसंघ, श्री जगतगुरु शंकराचार्य पीठम, मुंबई द्वारा इसकी कक्षाएं 9 सितंबर से 13 सितंबर तक दोपहर 2 से 4 बजे तक ली जाएगी।
महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले ने बताया कि अगर हम इस मोडी लिपि का अध्ययन करेंगे तो इतिहास के नए पन्ने सामने आएंगे. मोडी कोई भाषा नहीं है, वह तो मराठी भाषाकी एक लिपि है, जो सात शतकोंतक महाराष्ट्र की राज रही है। मोडी लिपि सात सौ साल पहले यादव काल से चली आ रही है। देवगिरी के राजा रामदेव राय के प्रधानमंत्री हेमंद्री पंत ने सबसे पहले मोडी लिपि की खोज की थी। कहते है कि इस लिपी की प्रेरणा उनको सिंहल (श्रीलंका) देश से प्राप्त हुई थी। 1230 में मोडी लिपि में पहली पुस्तक हेमाद्रि पंत द्वारा चतुर्वर्ग चिंतामणि लिखी गई थी। आज हमें इसे फिर से जानने का मौका मिल रहा है यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है।
मंडल के सचिव आचार्य चेतन दंडवते ने बताया कि समय के साथ-साथ मोडी लिपि में बदलाव होते रहे हैं और यह अधिक आसान होती गई है। मोडी लिपि में छत्रपति शिवाजी महाराज के समय दिए गए पत्र उपलब्ध हैं। चूंकि अंग्रेजों ने छत्रपति शिवाजी महाराज के रायगढ़ स्थित राजधानी को जला दिया था, इसलिए महाराज के समय के मोडी लिपि में दस्तावेज बहुत अधिक उपलब्ध नहीं हैं। परंतु पेशवा काल, भोंसले काल, होलकर काल, गायकवाड काल, पंवार काल, पंत प्रतिनिधी काल, सिंधिया काल के मोडी लिपि में सबसे अधिक दस्तावेज उपलब्ध हैं। पेशवाओं ने मोडी लिपि को राजलिपि का दर्जा दिया था। इसी वजह से आज पेशवा काल में मोडी लिपि में सबसे अधिक दस्तावेज उपलब्ध हैं। अकेले पुणे में पांच करोड़ दस्तावेज रखे गए हैं. मुंबई, नागपुर, कोल्हापुर, सातारा, सावंतवाडी, बडौदा, ग्वाल्हेर, रायपुर और संभाजीनगर (औरंगाबाद) में भी मोडी लिपि में दस्तावेज संरक्षित हैं।
मोडी लिपि सीखना बहुत आसान है. खास बात यह है कि मोडी लिपि में व्याकरण संबंधी कोई तनाव नहीं है. इसलिए, कोई भी इस लिपि को सीख सकता है। यदि हम इस प्राचीन लिपि पर ध्यान नहीं देंगे तो यह कालांतर में नष्ट हो जाएगी. मराठों का गौरवशाली इतिहास काल के पर्दे के पीछे लुप्त हो जाएगा. इसलिए महाराष्ट्र, मराठी भाषा व मराठों का गौरवसाली इतिहास को बचाने के लिए मोडी लिपी सिखना-सिखाना आवश्यक है। मोडी लिपी यह भारत की एक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व पुरातत्वीय विरासत है।
इसके संरक्षण के लिए छत्तीसगढ़ राज्य में पहली बार मोडी लिपी कार्यशाला का आयोजन हो रहा है। आयोजन महाराष्ट्र मंडळ, चौबे कॉलोनी, रायपुर द्वारा पांच दिनों के कार्यकाल में होगा। जिसमें सभी आयु, भाषा व वर्ग के सज्जन सम्मिलित हो सकते है। विशेषतः साहित्य, इतिहास और पुरातत्व विषय के छात्रों एवम् अध्यापकों के लिए यह कार्यशाला विशेष उपादेय होगी। इसके आयोजन में श्रीमद् जगद्गुरु शंकराचार्य पीठ की धर्मसभा-विद्वत्सङ्घ के अध्यक्ष ब्रह्मचारी निरञ्जनानन्द जी का कुशल मार्गदर्शन व सचिव पं हृषीकेश वैद्य जी का सहयोग है।
कार्यशाला में सम्मिलित होने के लिए अपने नाम का पंजीकरण महाराष्ट्र मंडळ के कार्यालयमें करन होगा। साथ ही एक पेन व खाता लाना होगा। इस कार्यशालामें आप ऑनलाईन भी सम्मिलित हो सकेंगे। ऑनलाईन सम्मिलित होने के लिए मीट आईडी व पासकोड मंडळ से प्राप्त किया जा सकता है।