समान गोत्र में नहीं करना चाहिए विवाह: आचार्य धनंजय
2025-09-10 08:06 AM
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0 महाराष्ट्र मंडल में श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह में तीसरे दिन सुनाई गई सृष्टि की उत्पति और सती- शिव विवाह की कथा
रायपुर। हर व्यक्ति में कोई न कोई विशिष्ट गुण होता है। जब भी समान गोत्र में विवाह किया जाता है, तो उनका यह गुण नष्ट हो जाता है। यही वजह है कि शास्त्रानुसार समान गोत्र में विवाह को वर्जित माना गया है। मंबई से पहुंचे धर्मसभा विद्वतसंघ श्रीश्री जगतगुरु शंकराचार्य पीठम के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रह्मचारी निरंजनानंद आचार्य वेदमूर्ति धनंजय शास्त्री ने महाराष्ट्र मंडल में जारी श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के तीसरे दिन इस आशय का मार्गदर्शन दिया।
आचार्य शास्त्री ने कहा कि हम सब में आज भी जो विशेष गुण मौजूद हैं, उसकी वजह हमारे पूर्वज हैं, जिन्होंने अलग- अलग गोत्र में विवाह कर अपने- अपने गुणों को संरक्षित और सुरक्षित रखा है। भागवत कथा सप्ताह के तीसरे दिन आचार्य धनंजय शास्त्री् ने सृष्टि की उत्पति और सती- शिव विवाह की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि जिस तरह चोट लगने पर हमारा सारा ध्यान उस चोट पर केंद्रित हो जाता है, ठीक उसी तरह ईश्वर की भक्ति के लिए अपना मन लगाना चाहिए।

आचार्य धनंजय शास्त्री ने बताया कि मैकाले शिक्षा के अनुसार मनुष्य की उत्पति बंदरों से हुई है, जबकि हमारे शास्त्रों बताते हैं कि मानव की उत्पति ऋषि- मुनियों से हुई है। आमतौर पर प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा पद्धति की कक्षाओं में एक अनुसुलझा सवाल चर्चा में रहता है कि पहले मुर्गी हुई या अंडा। आज तक इसका कोई जवाब नहीं मिला। वेदों के अनुसार कर्दम ऋषि जब लंबी तपस्या में बैठे थे, तो उन्हें निहारते हुए और उनकी विभिन्न मुद्राओं में कल्पना करते हुए उनकी पत्नी देवहुति में 84 लाख आकृतियां बनाई थीं उनमें एक भी मुर्गा था। कर्दम ऋषि ने अपनी तपस्या समाप्त होने के बाद सभी आकृतियों पर अभिमंत्रित जल छिड़क कर उन्हें जीवन प्रदान किया था। अर्थात शास्त्रों के अनुसार पहले मुर्गा हुआ था।
आचार्य ने कहा कि अभिभावक पुत्र का उपनयन संस्कार किसी भी उम्र में नहीं कर सकते। बल्कि उन्हें पांच वर्ष की आयु तक यह संस्कार कर लेना चाहिए। उसके बाद ही बच्चों को संस्कार, शिक्षा और वेदों का ज्ञान देना चाहिए। इसी तरह विवाह भी विविधत किया जाना चाहिए। इसमें कोई शार्टकट रास्ता नहीं अपनाना चाहिए।

प्रवचन में घासीदास संग्रहालय में प्रशंसा भी
मुंबई से पधारे आचार्य शास्त्री ने प्रवचन के दौरान शिव- सती के विवाह प्रसंग पर चर्चा करते हुए कहा कि यदि किसी को देखना है कि वास्तव में यह विवाह कैसे हुआ, तो उसे रायपुर का घासीदास संग्रहालय देखना चाहिए। यहां 900 साल पुरानी एक शीला है, जिस पर शिव- पार्वती विवाह का बड़ा खूबसूरत चित्रण है। असल में राजनेताओं को ज्ञान- विज्ञान की बातों से कोई मतलब ही नहीं है। यही संग्रहालय यदि अमेरिका में होता, तो वहां इससे ही वे लोग प्रतिदिन एक हजार डालर कमाते। म्युजियम बेहद खूबसूरती से बनाया गया है। इसका प्रचार- प्रसार करना चाहिए।