दिव्य महाराष्ट्र मंडल

अपने से गुणवान व्यक्ति के साथ प्रीति, कम के साथ करूणा और समान के साथ मैत्री भाव रखेः आचार्य धनंजय शास्त्री

महाराष्ट्र मंडल में चल रहे भागवत कथा के चौथे दिन भक्त प्रह्लाद और ध्रुव का कथा सुनाई

रायपुर। मनुष्य को अपने से अधिक गुणवान व्यक्ति के साथ हमेशा प्रीति का भाव रखना चाहिए। वहीं कम गुणवान वाले व्यक्ति के प्रति करूणा और समान गुण वाले से मैत्री का भाव होना चाहिए। मंबई से पहुंचे धर्मसभा विद्वतसंघ श्रीश्री जगतगुरु शंकराचार्य पीठम के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रह्मचारी निरंजनानंद आचार्य वेदमूर्ति धनंजय शास्त्री ने महाराष्‍ट्र मंडल में जारी श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्‍ताह के चौथे दिन इस आशय का मार्गदर्शन दिया।

आचार्य शास्त्री ने कहा कि अपने से अधिक योग्य और गुणवान व्यक्तियों के प्रति स्नेह और आदर का भाव रखना चाहिए।  जो व्यक्ति गुण में कम हैं, उनके प्रति दया और करुणा रखनी चाहिए। वहीं अपने समान या मिलते-जुलते गुणों वाले लोगों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध बनाए रखने चाहिए। आज के वर्तमान युग में हमें यहा सिद्धांत सिखाता है कि सामाजिक संबंधों में कैसा व्यवहार करना चाहिए।

आचार्य शास्त्री ने मुक्ति के चार प्रकार की व्याख्या करते हुए कहा कि मुक्ति के चार मुख्य प्रकार हैं। सालोक्य मुक्ति में भक्त उस लोक में जाता है जहां भगवान निवास करते हैं, या वह भगवान के लोक में ही रहता है। सामीप्य मुक्ति में भक्त भगवान के निकट रहता है और उनकी संगति का आनंद लेता है। सारूप्य मुक्ति में जीव भगवान के समान रूप, जैसे कि चतुर्भुज रूप, धारण करता है वहीं  सायुज्य मुक्ति मुक्ति का वह प्रकार है जहां भक्त भगवान के अस्तित्व में लीन हो जाता है, यानी भगवान के दिव्य तेज के साथ एकाकार हो जाता है।