दिव्य महाराष्ट्र मंडल

सामर्थ्‍य के अनुसार प्रयास करने पर भगवान देते हैं साथ: आचार्य धनंजय शास्‍त्री

0 महाराष्‍ट्र मंडल में जारी भागवत कथा के छठवें दिन आचार्य ने श्रीकृष्‍ण की लीलाओं का किया सविस्‍तार वर्णन  

रायपुर। कुपित इंद्रदेव गोकुल पर भारी वर्षा करते हैं। गोकुलवासियों को बाढ़ और वर्षाजन्‍य परेशानियों से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्‍ण गोवर्धन पर्वत उठा लेते हैं। परेशानी दूर होने पर गोवर्धन पर्वत के नीचे गोकुलवासी अपना मनोरंजन करने लगते हैं। तब श्रीकृष्‍ण उन्‍हें वर्तमान संकट से अवगत कराते हुए कहते हैं कि गोवर्धन पर्वत तो मैंने उठाया ही है, लेकिन इसके लिए आपका प्रयास भी होना चाहिए। यह पूरी लीला हमें बताती है कि हमें अपने सामर्थ्‍य के अनुसार प्रयास करना चाहिए। उसके बाद हमारे कार्य को भगवान स्वयं सिद्ध करेंगे। बिना प्रयास के सिर्फ भक्ति के बल पर हम सफल नहीं हो सकते। महाराष्‍ट्र मंडल के संत ज्ञानेश्‍वर सभागृह में जारी श्रीमद् भागवत कथा के छठवें दिन इस आशय का प्रवचन आचार्य धनंजय वैद्य शास्‍त्री ने दिया। 
आचार्यश्री ने श्रीकृष्ण की लीला का वर्णन करने के दौरान बताया कि यह हमारे पिछले जन्म का पुण्य है कि हमारा जन्म भारत भूमि में हुआ है। यह भूमि ऐसी है कि यहां न सिर्फ पुण्य कमाया जा सकता है, बल्कि अपने पापों का अंत भी किया जा सकता है। भारत में ही गंगा स्नान कर हम पाप मुक्त हो सकते हैं है, विदेश की किसी नदी में यह सुविधा नहीं है। अगर पिछले जन्म में हमारे कार्य पाप श्रेणी के होते, तो हम भारत के बदले अफगानिस्तान, ईरान, इराक में पैदा होते, जहां कभी भी बम फूट जाता है। हमें भारत भूमि में जन्म लेने के सौभाग्य का लाभ लेते हुए धर्म के मार्ग पर चलकर अधिक से अधिक पुण्य अर्जित करना चाहिए। 
 
 
आचार्य धनंजय शास्त्री ने कहा कि सन् 1965 से 1990 तक आस्तिकता का दौर चला। उसके बाद लोग धर्म और आध्यात्म की ओर लौटे। अब तक तीर्थ स्थलों, मंदिरों, मठों और मेलों में लोग की भारी भीड़ है, लेकिन श्रद्धालु धर्म को अपने जीवन में नहीं उतार रहे। स्थिति तो यह है कि प्राचीन तीर्थ स्थलों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ है और पैसे वाले लोग मोटी रकम से टिकट लेकर भगवान के वीआईपी दर्शन कर रहे है। धर्म में वीआईपी कल्चर ठीक नहीं है। जो लोग भगवान के दर्शन करने के लिए घंटों कतारबद्ध हैं क्या वे भक्त नहीं है? 
 
आचार्यश्री ने प्रवचन के सभागृह में बैठे सैकडों श्रद्धालुओं को यज्ञ में शामिल होने की विधि सविस्तार समझाई। इसी तरह शिशु जन्म के बाद उसके नामकरण का महत्व भी बताया। उन्होंने बताया कि बालकों के नाम दो, तीन या चार अक्षर में होने चाहिए जैसे राम, कृष्ण, विष्णु। पांच अक्षर में नाम नहीं होने चाहिए। इसी तरह बालिकाओं के नाम भी तीन या पांच अक्षरों में होने चाहिए, जैसे देवकी, जानकी इत्यादि। किसी भी दशा में नदी, पर्वतों के नाम पर नामकरण नहीं करना चाहिए। संभव हो तो भगवान के नाम पर बेटों का नाम रखना चाहिए। जैसे अजामिल ने अपने बेटे का नाम नारायण रखा था और अपने अंतिम क्षण तक उनके मुंह पर नारायण का नाम ही था। भगवान का नाम रखने से एक फायदा यह भी होता है कि बच्चे गलत कार्य करने से पहले सोचते हैं है, कि मैंने कुछ गलत किया तो लोग मुझे चिढ़ाएंगे।