अजय मधुकर काले, अध्यक्ष, महाराष्ट्र मंडल, रायपुर।
सुधीर मिश्रा अर्थात मेरे बड़े भाई…. जिनके स्नेह व आशीर्वाद के साथ रहते हुए मैं बड़ा हुआ। बैंक से सेवानिवृति पर मैंने उन्हें न तो कभी थका हुआ देखा और न ही उन्होंने पूरी जिंदगी अपने आसपास के लोगों को थकने दिए। सुधीर मिश्रा, एक ऐसा व्यक्तित्व जो हंसमुख हो, मिलनसार हो और दूसरों की मदद करने के अवसर भी तलाशता हो। 67 वर्ष आयु तक मैंने कभी भी उनका गुस्से में तमतमाया हुआ चेहरा नहीं देखा और न ही उनके स्वर कभी नाराजगी से भरी हुई तल्खी सुनी। समाजसेवा के क्षेत्र में उनका योगदान अनुकरणीय और अविस्मरणीय है, चाहे तात्यापारा युवा संघ के कार्यक्रम हो, भारतीय समाज गणेशोत्सव में समर्पण भाव से दिन-रात एक करके काम करने की बात हो या फिर श्री हनुमान मंदिर में सेवा कार्य हो। सुधीर भैया, लंबे समय तक मंदिर के कोषाध्यक्ष पद की जवाबदारी निभाते रहे। मंदिर के संचालन में हमेशा से ही उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
सुधीर भैया की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि उन्होंने अपने साथ- साथ मालती वहिनी को भी सेवा कार्य में समर्पित करा दिया। सुधीर भैया बृहन्न महाराष्ट्र मंडल के सम्मेलन में शामिल होने देश के किसी भी शहर में जाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। दान करने के मामले में भी सुधीर भैया का कोई सानी नहीं था। इसी तरह किसी भी संस्था, संगठन, मंदिर हो या कर्मचारी एसोसिएशन, हर जगह सेवा करने और नेतृत्व से मिली जवाबदारी को पूरे समर्पित भाव से निभाने में सुधीर भैया हमेशा सबसे आगे रहते थे।
सुधीर भैया न केवल महाराष्ट्र मंडल के सामाजिक कार्यों में इन्वॉल्व होते थे, बल्कि उन्होंने मंडल में सन् 1998 से 2002 तक कार्यकारिणी सदस्य, वर्ष 2002 से 2004 तक सह सचिव पद पर अपनी जवाबदारी को पूरी शिद्दत से निभाई। साल 2017 में महाराष्ट्र मंडल के पुराने भवन को ध्वस्त कर नया भवन बनाने की योजना बनी और इस पर काम शुरू हुआ तो सुधीर भैया ने कहा कि इस कार्य के लिए मैं आर्थिक सहयोग तो दूंगा ही, साथ ही भवन निर्माण के लिए अधिक से अधिक कलेक्शन करवाने में भी मेरा सहयोग रहेगा।
उन्होंने बैंक में सर्विस की। बैंक यूनियन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही। आल इंडिया के बैंक पदाधिकारियों से उनकी पहचान निराली ही थी। कालीबाड़ी स्कूल के विद्यार्थियों के बीच उनकी मिलनसारिता, हंसमुख स्वभाव आज भी उल्लेखनीय है। कालीबाड़ी स्कूल के मिलन समारोह में उन्होंने कहा था कि एक बार सजा के तौर पर गुरुजी ने उनका एक कान खींचा था। तब से उन्हें उसी कान से बेहतर सुनाई देता है, दूसरे कान की अपेक्षाकृत। किसी भी कार्यक्रम में ऐसा हल्का- फुल्का, हंसी- खुशी वाला वातावरण बनाने में सुधीर भैया का कोई मुकाबला नहीं था। परिवार के सदस्य के रूप में मालती वहिनी, बिटिया मालविका और दामाद अजय राव को हमारे सुधीर भैया की कमी जिंदगी भर खलेगी क्योंकि उन्हें सशक्त, सेवाभावी बनाने में सुधीर भैया की भूमिका को वे हमेशा याद रखेंगे। सुधीर भैया का हम सब को छोड़कर जाना, परिवार ही नहीं समाज की भी अपूरणीय क्षति है। उनके कार्यों, उनके स्वभाव, उनके सेवाभावी व्यक्तित्व, उनकी स्मृतियों को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
सादर श्रद्धांजलि....