दिव्य महाराष्ट्र मंडल

रंगमंच के भविष्‍य को लेकर चिंतित दिखा जम्‍मू का वरिष्‍ठ रंगसाधक लकी गुप्ता

रायपुर। महीनों रिहर्सल करने के बाद जब नाटक का मंचन किया जाता है, तो दर्शक दीर्घा में अगर कमी खलती है तो युवाओं की। अगर हमारा युवा वर्ग नाटकों से जुड़ेगा ही नहीं तो रंगमंच का भविष्‍य क्‍या होगा। इस विषय पर विचार करो तो चिंता होती है। महाराष्‍ट्र मंडल, रंगभूमि, अग्रगामी सहित विविध नाटक संस्‍थाओं से जुड़े रंगसाधकों से चर्चा करते हुए इस आशय के विचार जम्‍मू से यहां एकल नाटक लेकर पहुंचे वरिष्‍ठ रंगसाधक लकी गुप्‍ता ने व्‍यक्‍त किए।
 
लकी ने कहा कि युवाओं को रंगमंच की ओर आकर्षित करने के लिए हमें हरसंभव प्रयास करने चाहिए। साथ ही किसी भी नाटक को अधिक से अधिक मंचन कराने का प्रयास करना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि काफी समय तक नाटक की रिहर्सल करने के बाद जब उस नाटक का एक या दो मंचन ही होता है, तो कलाकार उस पात्र को ठीक से आत्‍मसात नहीं कर पाता। दूसरा, उस नाटक को लेकर शहर में अपेक्षित चर्चा भी नहीं हो पाती, ताकि युवा उस ओर आकर्षित हो सके। 
 
लकी गुप्‍ता ने कहा कि यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि आप नाटकों के माध्‍यम से दुनिया बदल देंगे या भारी बदलाव ले आएंगे। नाटकों के माध्‍यम से हम सिर्फ दर्शकों के मानस में एक विचार छोड़ते हैं। उन्‍होंने कहा कि रील्‍स और मीम्‍स बनाने से आपको क्षणिक लोकप्रियता तो मिल सकती है लेकिन इससे पहचान नहीं बनती। दुर्भाग्‍य से युवा इसे ही अपना कैरियर बनाना चाहते हैं। ऐसे में उन्‍हें नाटकों से जोड़ना कठिन हो सकता है, असंभव नहीं। 
 
चर्चा के दौरान लकी ने बताया कि उन्‍होंने रंगमंच का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया है। बस खुद से ही अभिनय सीखा है। 2010 में जम्मू से शुरू किया गया उनका एकल सफर, आज पूरे भारत में चर्चा का विषय बन गया है। लकी गुप्ता ने बिना किसी सरकारी या गैर-सरकारी सहायता के अपने अभिनय से देशभर के लाखों विद्यार्थियों को प्रेरित किया है। 
 
उन्‍होंने बताया कि 26 राज्यों के एक हजार से ज़्यादा कस्बों और शहरों में अपने एकल नाटक के 1700 से ज़्यादा शो किए हैं। इस दौरान, लकी ने बस, ट्रेन सहित विभिन्‍न माध्‍यमों से 60 लाख किलोमीटर से ज़्यादा की यात्रा की है। लकी अपने शो के लिए कोई शुल्क या भुगतान नहीं मांगते। लोग उन्हें जो खुशी- खुशी जो भी देते हैं, वे उसी के आधार पर अपनी यात्रा जारी रखते हैं।