जौहरी के बगैर महज कांच का टुकड़ा है हीरा... महाराष्ट्र मंडल में भी है ऐसा जौहरी... जिनकी खोज चंद्रयान तक पहुंच गई
2023-08-20 01:19 PM
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रायपुर। हीरा... कोयले की खान में तलाशने पर कांच की टुकड़ों की तरह ही नजर आता है। वह तब तक कीमती नहीं है, जब तक उसे तराशा ना जाए। पर हर कांच का टुकड़ा हीरा भी नहीं होता। उस हीरे की पहचान केवल हुनरमंद जौहरी को होती है, जो कांच के टुकड़ों की ढेर में उस हीरे को पहचान लेता है, फिर उसे तराशने के लिए मेहनत कर, उस टुकड़े को 'नायाब हीरे' का स्वरूप देता है।
आज हम एक ऐसे ही जौहरी से आपको रू—ब—रू करा रहे हैं, जिन्होंने कोयले की खान से एक बेशकीमती हीरे को ढूंढ निकाला। उसमें हीरे का गुण पहले से मौजूद था, लेकिन वह नायाब और बेशकीमती तब तक नहीं बन सकता, जब तक उसे तराशा ना जाए। जी हां, हम यहां पर बात कर रहे हैं महाराष्ट्र मंडल के आजीवन सदस्य रामदास जोगलेकर की, जिन्होंने 'भरत कुमार' को कोयले की खान से बाहर निकाला और उसे उसकी मंजिल तक पहुंचने में ऐसी मदद की, जिसकी वजह से 'भरत कुमार' आज चंद्रयान के सदस्य के तौर पर प्रतिष्ठित नाम है।
कौन है भरत कुमार
साल 2014 में 12वीं बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया। तब खबर चर्चा में थी कि केंद्रीय विद्यालय, भिलाई मार्शलिंग यार्ड के छात्र भरत कुमार ने पीसीएम यानी फिजिक्स, केमेस्ट्री और मैथ में क्रमश: 99,98 और 99 अंक हासिल किए हैं। उसकी चाहत आईआईटी में पढ़ने की थी। कोयले की खान और गरीबी के बीच फंसा भरत कुमार ही वह 'हीरा' था, जिसकी तलाश में महाराष्ट्र मंडल के आजीवन सदस्य रामदास जोगलेकर अपनी धर्मपत्नी की छोटी बहन वनजा भावे के साथ में चरोदा के उस माशर्लिंग यार्ड पहुंचे। तलाशने के दौरान उन्होंने देखा कि एक छोटी सी झोपड़ी के सामने एक किशोर छात्र बर्तन धोते बैठा हुआ है। उन्होंने जब भरत का नाम लेकर पूछा, तो उसने बताया कि वही भरत है। उसकी मार्कशीट देखी तो, अचरज भरी निगाहों से ताकते ही रह गए।
भरत के भीतर जो क्षमता थी, रामदास जोगलेकर और वनजा भावे ने उसे पहचान लिया, जिसके बाद वनजा भावे के पति अरूण भावे से फोन पर संपर्क किया और फैसला लिया कि वे भरत को आईआईटी में दाखिला दिलाने के लिए उसकी कोचिंग का पूरा खर्च उठाएंगे। यहां से उसे तराशने का काम शुरु हुआ, तो वह हीरा यानी भरत वक्त के साथ निखरता गया और उसे आईआईटी धनबाद में आखिरकार दाखिला मिल गया।
रामदास जोगलेकर और अरूण भावे यह समझ चुके थे कि भरत के भीतर कितनी काबिलियत है, लिहाजा उन्होंने भरत को हर सेमेस्टर में चुनौती दी, जिसके लिए उसे पुरस्कृत भी करने की बात हुई। भरत ने उस चुनौती को स्वीकार किया और पहला सेमेस्टर छोड़, बाकि के सातों सेमेस्टर में टॉप किया और मैकेनिकल इंजीनियर के तौर पर आईआईटी में गोल्ड मेडल हासिल कर इन जौहरियों की उस आस को भी पूरा किया, जिसकी चाहत लिए जोगलेकर और भावे ने भरत कुमार को आगे बढ़ाया था। चौंकाने वाली बात यह रही कि कैंपस सलेक्शन में एकमात्र भरत ही था, जिसका चयन एक बड़े सरकारी संगठन के लिए हुआ।
आज वही भरत चंद्रयान की उस टीम का हिस्सा है, जिसकी लैंडिंग चंद्रमा पर होने वाली है। जिस पर ना केवल भारत की बल्कि पूरे विश्व की निगाहें जमी हुईं है, इसरो उस पल के इंतजार में है, जब चंद्रमा पर चंद्रयान 3 उतरेगा। इस चंद्रयान के निर्माण में जिस मैकेनिकल इंजीनियर ने अपनी ताकत झोंकी है, वह महाराष्ट्र मंडल के उसी जौहरी रामदास जोगलेकर की खोज है, जिन्होंने वनजा भावे और अरूण भावे की मदद से उसे तराशा।