दिव्य महाराष्ट्र मंडल

टीचर्स ट्रेनिंग प्रोग्राम में कंम्युनिकेशन स्किल्स पर प्रा. अनिल श्रीराम काळेले दिए गए अहम टिप्स

रायपुर। आपके शारीरिक हाव भाव यानी किनिक्स, दूरी मतलब प्रॉक्सिमिक्स और स्पर्श (हैप्टिक्स) का उपयोग शब्दहीन संप्रेषण का उदाहरण है। क्लास रूम में आपकी ओर से किए गए इशारे, स्पर्श, शरीर की भाषा, बैठने का तरीका, चेहरे का भाव, आंखों का संपर्क शब्दहीन संप्रेषण में आते हैं। विद्वानों का तर्क है कि शाब्दिक संचार की तुलना में अशाब्दिक संचार अधिक अर्थ दे सकते हैं। क्लास रूम में पढ़ाते समय आपकी बाॅडी लैंग्वेज काफी कुछ कह जाती है। इसका सही और बिना साइकोलाॅजिकल बैरियर के होना बेदह जरूरी है, ताकि आप बच्चों से अच्छी तरह कम्युनिकेट कर सके। 
 
महाराष्ट्र मंडल के य.गो. जोगलेकर स्मृति छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह में टीचर्स ट्रेनिंग प्रोग्राम के दूसरे दिन संत ज्ञानेश्वर स्कूल (एसडीवी) के शिक्षक- शिक्षिकाओं से प्रा. अनिल श्रीराम काळेले ने कही। कार्यक्रम में महाराष्ट्र मंडळ के एसडीवी के सह प्रभारी परितोष डोनगांवकर, वरिष्ठ आजीवन सभासद दीपक पात्रीकर, सचेतक रविंद्र ठेंगड़ी प्रमुख रूप से उपस्थित थे। 
 
काळेले ने जानकारी दी कि नॉन-वर्बल कम्युनिकेशन में चेहरे के भाव और हावभाव, आवाज की टोन, आवाज की पिच और ठहराव, आवाज़ का उतार-चढ़ाव, व्यक्ति की चाल, उसके शरीर का पोस्चर, उसकी हरकतें और सामान्य तौर पर कम्युनिकेशन के दौरान उसका व्यवहार शामिल होता है। इन सभी घटकों को बॉडी लैंग्वेज या नॉन-वर्बल कम्युनिकेशन का साधन कहा जाता है, जिनकी मदद से हम अचेतन रूप से अपनी सच्ची भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
 काळेले ने कहा कि प्रभावी कम्युनिकेशन में साइकोलाॅजिकल बाधाएं आती हैं। डर, घबराहट, भ्रम, थकान, दर्द, अविश्वास और ईर्ष्या की अलावा ऐसी अन्य कई भावनाएं हैं, जो संचार को प्रभावित करती हैं। जीवन भर हम अपनी आवश्यकताओं और रुचियों के आधार पर सूचनाओं को फ़िल्टर करते हैं, जो इस बात को प्रभावित करती हैं कि हम कैसे सुनते हैं। जब प्रेषक और प्राप्तकर्ता के संदर्भ के अलग-अलग फ़्रेम होते हैं, तो यह संचार को मुश्किल बना सकता है। संचार व्यक्ति की भावनात्मक मनःस्थिति से अत्यधिक प्रभावित होता है।