एक संकल्प और एक भावना में समाहित होकर राष्ट्रगीत का सामूहिक गान करें
बता दें कि देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत चट्टोपाध्याय ने 7 नवम्बर 1875 को वंदेमातरम् की रचना की थी. वंदे मातरम् को कांग्रेस के अधिवेशन में प्रथम बार कलकत्ता में 1896 में गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने गाया. इसके बाद यह कांग्रेस के अधिवेशनों में परंपरागत रूप से गाया जाने लगा. वर्ष 1901 में भी कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया, यहां चरणदास ने गायन किया. वर्ष 1905 में वाराणसी में आयोजित अधिवेशन में सरला देवी ने गायन किया. वर्ष 1923 में गायन के समय इसका विरोध हुआ. वंदे मातरम् की प्रबल राष्ट्रीय भावना के प्रकटीकरण के लिए ही स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने अपने समाचार पत्र का नामकरण ही “वंदे मातरम्” किया. अंग्रेजों की गोली लगने से शहीद हुईं क्रातिकारी मांतगिनी हजारा ने “वंदे मातरम्” का उद्घोष करते हुए अपने प्राण त्याग दिये थे. जर्मनी में मैडम भीकाजी कामा ने “वंदे मातरम्” लिखा तिरंगा स्टेट गार्ड में फहराया था. इसे जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास “आनन्द मठ” में 1882 में शामिल किया तो यह क्रांति गीत बन गया.