इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख़्त फटकार: एनकाउंटर नहीं, न्यायपालिका ही तय करेगी सज़ा
2026-01-31 12:55 PM
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प्रयागराज| इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी फटकार लगाई। अदालत ने एक आरोपी को ज़मानत देते हुए यह सवाल उठाया कि आखिर क्यों बार-बार आरोपियों को घुटने या उससे नीचे गोली मारी जाती है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह प्रवृत्ति कानून के दायरे से बाहर है और न्यायपालिका की भूमिका को चुनौती देने वाली है।
आरोपी को ज़मानत और पुलिस पर सवाल
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने आरोपी को ज़मानत प्रदान की। साथ ही अदालत ने यह भी दर्ज किया कि पुलिस द्वारा बार-बार घुटने के नीचे गोली मारने की घटनाएं न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती हैं। अदालत ने इस पैटर्न को गंभीर चिंता का विषय बताया।
प्रमोशन और लोकप्रियता की चाह
कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे एनकाउंटर अक्सर आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन पाने या सोशल मीडिया पर मशहूर होने के लिए किए जाते हैं। अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति न केवल कानून के खिलाफ है बल्कि पुलिस की जिम्मेदारी और उसकी नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
न्यायपालिका का अधिकार बनाम पुलिस की भूमिका
हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “ऐसा काम कानून की नज़र में मंज़ूर नहीं है क्योंकि आरोपी को सज़ा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं।” अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि न्यायिक फैसले सुनाना।
लोकतंत्र और संविधान की कसौटी
अदालत ने अपने आदेश में भारत के लोकतांत्रिक स्वरूप की याद दिलाई। कोर्ट ने कहा कि देश को संविधान के मूल्यों और निर्देशों के अनुसार चलाया जाना चाहिए, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिकाएं साफ तौर पर अलग की गई हैं। इस विभाजन का सम्मान करना ही लोकतंत्र की असली ताक़त है।