छत्तीसगढ़

बारनवापारा अभ्यारण्य में वन भैसा शावक की मौत # उठे सवाल

रायपुर। बारनवापारा अभ्यारण्य में वन विभाग की ओर से संरक्षित वन भैसों के समूह में एक बड़ी घटना सामने आई है। 8 सितंबर को जन्मे एक शावक की 15 सितंबर को अचानक मौत हो गई। यह वही समूह है जिसमें असम से लाए गए वन भैसों को रखा गया है। इस घटना ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ में वन भैसा संरक्षण परियोजना की स्थिति और सरकार के प्रयासों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ज्ञात हो कि छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वन भैसा है। प्रदेश में इनकी संख्या बेहद सीमित हो चुकी है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में केवल एक नर वन भैसा ‘छोटू’ ही शेष है, जो उम्र के अंतिम पड़ाव पर है। इनकी संख्या बढ़ाने और प्रजाति को बचाने के प्रयास में 2020 में असम से एक नर और एक मादा वन भैसा लाए गए थे। इसके बाद 2023 में चार और वन भैसे लाकर इस समूह को मजबूत किया गया। इनसे पिछले वर्ष दो शावकों का जन्म हुआ था और इस वर्ष 8 सितंबर को दो और शावक जन्मे।

हालांकि, जन्म के कुछ दिनों बाद ही एक शावक की मौत हो गई। विभागीय सूत्रों के अनुसार, शावक की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई है, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षणवादियों में नाराजगी और चिंता साफ झलक रही है। उनका कहना है कि वन भैसों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया केवल दिखावे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इनकी आनुवंशिक शुद्धता और दीर्घकालिक संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का तर्क है कि असम के वन भैसों और छत्तीसगढ़ के वन भैसों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण आनुवंशिक अंतर पाया जाता है। भारत सरकार की विभिन्न संस्थाओं की रिपोर्टों में यह तथ्य दर्ज है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या असम से लाए गए वन भैसे वास्तव में छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु माने जा सकते हैं

वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह पहल जनता के बीच वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनकी भावनात्मक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए की गई है। उनका कहना था, छत्तीसगढ़ के लोग अपने राजकीय पशु से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं, इसलिए यह प्रयास किया गया कि उन्हें फिर से अपने जंगलों में वन भैसे दिखाई दें।

इस बीच चर्चा यह भी है कि वन विभाग असम से और अधिक वन भैस लाने की तैयारी कर रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आनुवंशिक विविधता और स्थानीय प्रजाति के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और ठोस कार्ययोजना जरूरी है। अन्यथा यह प्रयास केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाएंगे और वास्तविक संरक्षण का लक्ष्य अधूरा रह जाएगा।

बारनवापारा में शावक की मौत इस बात की याद दिलाती है कि वन्यजीव संरक्षण केवल संख्या बढ़ाने का खेल नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें आनुवंशिक शुद्धता, आवास संरक्षण और पशु-मानव संघर्ष को ध्यान में रखकर ही निर्णय लिए जाने चाहिए।